विमर्श की शुरुआत करते हुए लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ के कुलपति ने कहा कि पुराने शास्त्रों में तीन ही रोगों का जिक्र है। पहला ईर्ष्या, दूसरा भूख न लगना और तीसरा वृद्धावस्था। आजकल नई-नई बीमारियों ने जन्म लेती हैं। सभी तरह की औषधियां भावों पर काम करती हैं। यदि भाव बेहतर होगा, तभी औषधियों का फायदा है। हमारे पास ज्ञान की पुरानी परंपरा रही है, जो आज करीब-करीब मिट गई है। जरूरत है कि परंपरा को विज्ञान से जोड़ा जाए। इस दिशा में वैज्ञानिक बेहतर काम कर सकते हैं।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के कुलपति प्रोफेसर राकेश भटनागर ने कहा कि जरूरत है कि ऐसे शोध को वैज्ञानिक प्रमाणिकता के दायरे में लाया जाए। इसमें कई बिंदुओं पर विस्तृत शोध की जरूरत है। इससे दुनिया में इसे महत्व मिलेगा। सामूहिक कुंभ स्नान और कल्पवास के दौरान अपनाई जाने वाली जीवनशैली कई तरह के बदलाव लाती है।
बौद्धिक विमर्श की अध्यक्षता कर रहे सुनील पांडेय ने कहा कि हमें पश्चिम की तरफ देखना बंद करना चाहिए। जरूरत है कि हम अपने ज्ञान को ज्यादा से ज्यादा टटोलें।
चेतना जैसे विषयों पर भारत में बहुत शोध और दर्शन मौजूद है। इसको आगे लाने की जरूरत है। वहीं, कुंभ स्नान को लेकर शोध व अन्य कार्यों के लिए एक संस्थान की भी जरूरत है। बीएचयू के बायोकेमेस्ट्री विभाग के प्रोफेसर डॉ. यामिनी भूषण त्रिपाठी ने कहा कि सूक्ष्म जीवाणुओं का शरीर पर अच्छा प्रभाव देखा गया है। शोध में उनके जरिए किए गए विश्लेषण में यह पाया गया है।
वहीं, राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र के अतिरिक्त निदेशक व डॉक्टर सुनील गुप्ता ने कहा कि इस विषय पर और शोध किए जाने की जरूरत है। कुंभ में इस बार केंद्र की ओर से भी कैंप लगाए जाएंगे। एंटी माइक्रोबैक्टीरियल रजिस्टेंस (एएमआर) की समस्या को लेकर लगातार काम किया जा रहा है। एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल बढ़ने से लोगों में नई-नई तरह की परेशानियां शुरू हुई हैं। दवा कंपनियां एंटीबायोटिक के असर को बढ़ाने के लिए उसका डोज बढ़ाती जा रही है। ऐसे समय में संक्रामक रोगों को रोकने के लिए प्राकृतिक टीका बेहद उपयोगी हो सकता है। डॉ. वाचस्पति ने बताया कि कुंभ स्नान को खगोलीय दृष्टि से भी तय किया गया है। वैज्ञानिक प्रमाणिकता के लिए खगोलीय शोध के लिए कई संस्थानों ने सहमति दिखाई है। इस पर जल्द ही शोध शुरू होगा।
बीएचयू के समाजशास्त्र के प्रोफेसर अरविंद जोशी ने बताया कि कुंभ स्नान और कल्पवास बिना निमंत्रण के करोड़ों लोगों को खींचता है। यह टूटते-बिखरते और अकेलेपन की मार झेल रहे समाज को एकीकृत करने का काम भी कर रहा है। वहीं, समाजशास्त्र के ही प्रोफेसर टीबी सिंह ने कहा कि ऐसे शोध में सैंपल के तरीके का विशेष महत्व है। इस पर पूरी तैयारी होनी चाहिए। बौद्धिक विमर्श में डॉक्टर श्रीपति त्रिपाठी, वेंकटेश्वर यूनिवर्सिटी के डॉक्टर माचा भास्कर, प्रोफेसर ग्रिग जेम्स आदि उपस्थित थे।