संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली।मंदिरों में घंटियां बजती हैं, घरों में झांकियां सजती हैं और भजन गूंजते हैं। रंगमंच इन सबको अपनी अलग भाषा देता है। यहां कृष्ण को नृत्य, संगीत, अभिनय, प्रकाश और कथा के जरिए महसूस किया जाता है। सुमित्रा चरत राम की मूल परिकल्पना से शुरू हुई जन्माष्टमी की ‘कृष्ण’ प्रस्तुति ने 50 साल पूरे कर लिए हैं। श्रीराम भारतीय कला केंद्र की ओर से हर वर्ष होने वाली इस प्रस्तुति का आयोजन शुक्रवार को कमानी ऑडिटोरियम में हुआ।
निर्देशक पद्मश्री शोभा दीपक सिंह के अनुसार, कृष्ण को केवल देवता के रूप में देखना उनके व्यापक व्यक्तित्व को सीमित करना है। वे यशोदा के नटखट लाल, गोपियों के प्रिय, अत्याचार के खिलाफ खड़े नायक और अर्जुन के सारथी-हर रूप में अलग भाव जगाते हैं। माखनचोर कृष्ण में बालमन, राधा के कृष्ण में प्रेम, कंस के सामने प्रतिरोध और गीता के कृष्ण में दर्शन दिखाई देता है। यही विविधता उन्हें रंगमंच का असाधारण पात्र बनाती है।