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कालजयी अटल: राजधर्म के अटल प्रणेता संवेदनाओं का भी रखते थे ध्यान

Fri, 17 Aug 2018 09:57 AM IST
शरद गुप्ता, अमर उजाला, नई दिल्ली
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- फोटो : अमर उजाला
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मई, 1996 की एक दोपहर अटल बिहारी वाजपेयी के रायसीना रोड स्थित बंगले पर भारी भीड़ थी। भाजपा कार्यकर्ता और पत्रकार जानना चाहते थे कि आखिर पार्टी ने क्या फैसला किया है? क्या सबसे बड़े संसदीय दल के नाते वह सरकार बनाएगी या बहुमत न होने की वजह से दावा छोड़ देगी। आखिर वाजपेयी बाहर आए और बोले कि कृपया मेरी क्यारियों में न चलें। मैंने कल ही इनमें बीज बोए हैं। ऐसे थे वाजपेयी। राजनीतिक आपाधापी में भी मानवीय संवेदनाओं का ध्यान रख पाना कम ही राजनेताओं को आता है।

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अटल ने घोषणा कर दी कि पार्टी ने सरकार बनाने का दावा पेश नहीं करने का फैसला किया है। हालांकि, अगले ही दिन वह राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा से मिले और सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया। विश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान सत्ता के लालची होने के खूब आरोप लगे। वाजपेयी ने अपने भाषण में कहा कि सरकार बनाने का निर्णय मेरा नहीं था। पार्टी का था। मतदाताओं ने भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी बनाया।

ऐसे में जब राष्ट्रपति महोदय ने हमें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया तो मैं क्या करता? क्या मैदान छोड़ देता? क्या मैं अपनी जिम्मेदारी से भाग जाता? हमने एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम बना उस पर सभी पार्टियों का समर्थन मांगा। राष्ट्रपति महोदय ने हमें 31 मई तक बहुमत साबित करने को कहा। आज 28 तारीख है। हमें जरूरी समर्थन नहीं मिल सका। अब मैं 31 तक भी नहीं रुकूंगा। मुझे कुर्सी का मोह नहीं है। कृपया मेरी नीयत पर संदेह मत कीजिए। मैंने कभी दूसरे तरह के खेल नहीं खेले हैं और न ही खेलूंगा।

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अटल के वादे के बाद नहीं हुईं हिंसक घटनाएं

- फोटो : pti
इस के बाद वह उठे। सीधे राष्ट्रपति भवन गए और इस्तीफा दे दिया। ऐसे थे वाजपेयी। 24 कैरेट खरे, जिनकी ईमानदारी, वाकपटुता और सौम्य स्वभाव की मिसालें उनके राजनीतिक विरोधी भी दिया करते थे। यही वजह है कि हिंदुत्ववादी भाजपा के झंडाबरदार होने के बावजूद उन्हें मुसलमानों और ईसाइयों के वोट थोक में मिलते थे। सभी समुदायों को उन पर भरोसा था।

1998 में उनके प्रधानमंत्री बनते ही ईसाइयों पर हमले होने लगे। मध्य प्रदेश के झाबुआ में जंगलों से बलात्कार, उड़ीसा में ग्राहम स्टेंस को जिंदा जलाया, गुजरात और दूसरे प्रदेशों में कई घटनाएं घटीं। लोग आक्रोशित हो उठे।

दिसंबर के आखिरी सप्ताह में वह परिवार के साथ छुट्टी मनाने अंडमान निकोबार गए। जाते समय भुवनेश्वर और लौटते समय बंगलूरू के राज भवन में ईसाई धर्मगुरुओं ने उनसे मुलाकात की। वाजपेयी ने उनकी बात सुनी और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई का वादा किया। उसके बाद न तो घटनाएं घटीं और समुदाय भी शांत हो गया।

गोवा में पहनी रंगीन टीशर्ट और बरमूडा
गोवा में हुई भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के दौरान एक शाम वाजपेयी अपने होटल में नई वेशभूषा में चहलकदमी करते दिखे। रंगीन टीशर्ट और लंबी बरमूडा-नुमा नेकर। हमेशा धोती-कुर्ता या बंद गले के सूट में दिखने वाले अटलजी को इन कपड़ों में देखकर लोग अचंभित दिखे। अटलजी बोले, जैसा देश-वैसा भेष। ठीक है ना। क्या मैं सूट या धोती में समुंदर के किनारे जाऊं ?

कारगिल युद्ध के बाद भी की आगरा शांतिवार्ता

- फोटो : pti
वह कश्मीर में शांति और पाकिस्तान के साथ दोस्ती दोनों मामलों को लेकर बहुत संजीदा थे, लेकिन कभी कारगिल युद्ध, कभी कंधार विमान अपहरण तो कभी संसद पर आतंकी हमले के बहाने शांतिवार्ता को पटरी से उतारने की साजिश होती रही। फिर भी वाजपेयी ने आगरा शांतिवार्ता आयोजित की। मुशर्रफ के अड़ियल रवैये की वजह से वह भी विफल रही। इसके बावजूद वह पाकिस्तान के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाने के इच्छुक थे।

पद मिलने तक चलती रहेगी यात्रा
एक बार लंबी पदयात्रा के दौरान किसी ने उनसे पूछा कि यह पदयात्रा कब तक चलेगी। वाजपेयी ने तुरंत उत्तर दिया पद मिलने तक यात्रा चलती रहेगी। ऐसे गजब के हाजिरजवाब थे वाजपेयी। कभी-कभी मुश्किल सवालों के जवाब में उनकी मुस्कान से ही संतोष करना पड़ता। एनडीए की प्रधानमंत्री आवास पर चलने वाली बैठकों के दौरान पत्रकार घंटों धूप में खड़े रहते। वाजपेयी ने न सिर्फ सबके बैठने के लिए सीढ़ीनुमा बेंच बनवा दीं, बल्कि समय-समय पर उन्हें पानी या चाय-नाश्ता भी भिजवाते थे। 

पैसे नहीं होने के कारण पैदल जाते थे संसद
बचपन से संघ के प्रचारक बन गए अटल संघ से मिलने वाली दक्षिणा पर ही निर्भर थे। चांदनी चौक में संघ के दफ्तर में ही एक और प्रचारक जगदीश प्रसाद माथुर के साथ रहते थे। 1957 में सांसद बने। रिक्शे के पैसे नहीं होने के कारण दोनों मित्र चांदनी चौक से संसद तक पैदल जाते। माथुर पुस्तकालय में बैठकर अटल के भाषणों के लिए संदर्भ इकट्ठा करते। छह माह बाद एक शाम अटल ने माथुर से कहा, ‘माथुरजी, आज तो जेब में पैसे हैं, ऐश होगी। संसद से बाहर निकलकर दोनों ने कनाट प्लेस के लिए रिक्शा लिया। गांधी आश्रम से दो-दो जोड़ी धोती-कुर्ते खरीदे। फिर रिक्शा कर चांदनी चौक गए और चाट खाई।

वाजपेयी के कारण ही बन पाया एनडीए

- फोटो : pti
1998 में एनडीए बनाने में वाजपेयी के स्वभाव और आचरण की बड़ी भूमिका थी। अन्नाद्रमुक, बीजद और जदयू से लेकर तृणमूल कांग्रेस तक सभी को उन पर पूरा भरोसा था। ममता बनर्जी तब बात-बात पर आग बबूला हो जातीं। सीधे वाजपेयी से आधे घंटे का समय मांगतीं। पौन घंटे तक लगातार बोलती रहतीं। वाजपेयी शांति से उन्हें सुनते। अच्छी खातिरदारी करते। फिर कोरा आश्वासन देकर विदा कर देते। 

राममंदिर के मुद्दे पर बढ़ गए थे संघ से मतभेद
समय के साथ संघ के साथ अटल के मतभेद भी बढ़ने लगे थे। सरकार बनने के बाद आर्थिक नीति से लेकर, श्रम संगठनों तक और राममंदिर निर्माण के मामले पर भी संघ के अनुषंगी संगठनों के साथ उनका कई बार टकराव हुआ।

वाजपेयी विनिवेश के पक्षधर थे। भारतीय मजदूर संघ इसके खिलाफ था। वाजपेयी विदेशी पूंजी का निवेश चाहते थे। स्वदेशी जागरण मंच इसके खिलाफ था। विश्व हिंदू परिषद ने राममंदिर के मामले पर राम शिला पूजन कार्यक्रम कर वाजपेयी की मर्जी के खिलाफ आंदोलन खड़ा कर दिया था।

शिक्षा नीति को लेकर भी संघ से विवाद रहा। ऐसे में वाजपेयी ने प्रचारक का चोला उतार फेंका और बंगलूरू में आयोजित पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में 2 जनवरी, 1999 को कहा कि पार्टी के साथ सभी मुद्दों पर बातचीत उचित है और जारी रहनी चाहिए, लेकिन सरकार चलाने के मामलों में प्रधानमंत्री का फैसला ही अंतिम होगा। तब कुशाभाऊ ठाकरे भाजपा अध्यक्ष थे।
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बिना किसी से बात किए आडवाणी को बनाया उपप्रधानमंत्री

अटल और लालकृष्ण आडवाणी के बीच जैसा सामंजस्य था, उसकी मिसाल कम ही मिलेगी। दोनों अधिकतर मामलों में एक-दूसरे से परामर्श जरूर करते थे, लेकिन प्रधानमंत्री पद के लिए वाजपेयी का नाम आडवाणी ने बिना किसी से परामर्श किए घोषित कर दिया था। ऐसे ही आडवाणी के उपप्रधानमंत्री बनाने से पहले वाजपेयी ने किसी से कोई बात नहीं की थी, न संघ से और न पार्टी से। 

आहार-व्यवहार में एक-दूसरे के उलट थे अटल-आडवाणी
अटल-आडवाणी में एक पाकिस्तान से आया अंग्रेजीदां था तो दूसरा खांटी हिंदीभाषी। एक भाषण देने में हिचकता था, तो दूसरा लाखों को मंत्रमुग्ध करने में माहिर था। एक संगठन का महारथी था, तो दूसरा संगठन के बंधनों में बंधने को तैयार नहीं। एक शुद्ध शाकाहारी तो दूसरा मांसाहारी। जीवनशैली में कोई सामंजस्य न होने पर भी दोनों में गजब की समझ थी।

कोई भी फैसला लेने से पहले आडवाणी पहले वाजपेयी से पूछते और वाजपेयी बेपरवाही से कह देते जो आपको ठीक लगे। आडवाणी भी ख्याल रखते कि ऐसा कोई फैसला न लें जो वाजपेयी को नागवार गुजरे। कैबिनेट की बैठक में यूं तो वाजपेयी चुप रहते। उसे ही उनकी स्वीकृति माना जाता। अगर किसी मामले पर उनका कोई सवाल होता तो आडवाणी उस पर तुरंत आगे चर्चा ही रोक देते।  
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