हाईकोर्ट ने माना है कि गवाह के रूप में बच्चे खतरनाक होते है, क्योंकि उन्हें आसानी से प्रभावित किया जा सकता है। अदालत को जब तक उनके द्वारा दिए गए साक्ष्य को स्वीकार नहीं करना चाहिए जब तक गवाह की सच्चाई की सावधानी से पूर्वक जांच न की जाए।
न्यायमूर्ति जी.एस सिस्तानी व न्यायमूर्ति संगीता ढींगरा सहगल की खंडपीठ ने कहा कि निचली अदालत के न्यायाधीश ही इस तरह के एक गवाह की परीक्षा, बच्चे की क्षमता और बुद्धि को समझने के दायित्व को निभा सकता है।
खंडपीठ ने कहा कि यह एक स्थापित सिद्धांत है कि बच्चे गवाहों के तौर पर खतरनाक होते है, वे लचीला होने के साथ आसानी से प्रभावित हो जाते है। खंडपीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ऐसे साक्ष्यों को सावधानी से जांचने के बाद ही उनकी गवाही स्वीकारती है कि मामले को प्रभावित नहीं किया गया।