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खबर जो खो गईः 23 साल पहले दिल्ली के इस आशिक ने प्रेमिका को पाने के लिए बहा दिया था उसी का खून

Fri, 19 Jul 2019 12:25 PM IST
पूजा त्रिपाठी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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23 साल पहले 1996 में पूरे देश को हिलाकर रख देने वाली एक ऐसी घटना हुई थी जिसने लोगों का पुलिस और कानून से भरोसा लगभग उठा दिया था। एक बड़े पिता की बिगड़ी औलाद ने कुछ ऐसा कर दिया जो लंबे समय तक लोगों के जेहन में रहा।

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यह मामला था प्रियदर्शिनी मट्टू दुष्कर्म और हत्या का। आप सोच रहे होंगे कि हम आपको इस बारे में आज क्यों बता रहे हैं, तो इसके पीछे वजह है कि इस मामले का दोषी संतोष सिंह सालों बाद रिहा हो सकता है।

प्रियदर्शनी मट्टू हत्याकांड में उम्रकैद की सजा काट रहे संतोष कुमार को रिहा करने की तैयारी है। जेल प्रशासन ने इनके साथ 205 कैदियों को छोड़ने के लिए 19 जुलाई को इनके नाम सेंटेंस रिव्यू बोर्ड (एसआरबी) को भेजने का फैसला किया है।
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संतोष की रिहाई की अर्जी पहले भी एसआरबी खारिज कर चुका है। ऐसे में इस बार यह देखना रोचक होगा कि अब एसआरबी क्या फैसला लेता है। 

आइए जानते हैं कि आखिर संतोष सिंह ने ऐसा क्या किया था, जिसकी इतनी लंबी सजा काटने के बाद भी एसआरबी उनकी रिहाई के लिए नहीं मान रहा है।

हुआ बार-बार रिजेक्ट फिर भी करता रहा पीछा

यह मामला है 1996 का। प्रियदर्शिनी मट्टू नाम की लड़की दिल्ली विश्वविद्यालय की फैकल्टी ऑफ लॉ से एलएलबी कर रही थी। श्रीनगर से स्कूली पढ़ाई और जम्मू से बीकॉम करने के बाद जब प्रियदर्शिनी मट्टू दिल्ली पहुंची तो उसने डीयू से कानून की पढ़ाई शुरू की।

यहां कॉलेज में उसका एक सीनियर था संतोष जो उसका दीवाना था। वह अक्सर ही प्रियदर्शिनी का पीछा करता था। कई बार तो उसने प्रियदर्शिनी को प्रपोज तक कर डाला लेकिन वह हर बार मना कर देती।

हद तो तब हो गई जब संतोष कॉलेज से पास होकर निकल गया लेकिन वह अक्सर ही अपनी बुलेट लेकर कॉलेज पहुंच जाता और घूमता रहता। संतोष ने प्रियदर्शिनी को इतना ज्यादा परेशान कर दिया था कि उसने पुलिस में शिकायत कर दी थी। इसके बाद प्रियदर्शिनी को निजी बॉडी गार्ड के तौर पर हेड कांस्टेबल राजिंदर सिंह की सुरक्षा मिली। 
 

प्रिया ने की शिकायत तो संतोष ने उसके खिलाफ ही कर दी ये कंप्लेंट

संतोष को चेतावनी भी दी गई कि वह प्रियदर्शिनी से दूर रहे लेकिन उसने अपनी हरकतें छोड़ने के बजाय प्रियदर्शिनी के खिलाफ ही शिकायत कर दी कि वह दो-दो डिग्रियों के लिए पढ़ रही है।

इस शिकायत के बाद प्रियदर्शिनी को सबूत देना पड़ा कि उसकी एम. कॉम की पढ़ाई पहले ही खत्म हो चुकी है और अब वो सिर्फ कानून की पढ़ाई कर रही है। इसके बाद भी वह लगातार प्रियदर्शिनी को परेशान करता रहा। फिर दिन आया 23 जनवरी 1996 का। यही वो दिन था जिसकी डरावनी परछाइयां आज भी लोगों के रूह कंपा देती है।

23 जनवरी के दिन प्रियदर्शिनी के निजी बॉडी गार्ड राजिंदर सिंह को ड्यूटी पर पहुंचने में देर हो गई तो प्रिया अपने मम्मी-पापा के साथ कॉलेज के लिए निकल गई। ड्राइवर ने पहले उनके माता-पिता को तीस हजारी कोर्ट छोड़ा और फिर प्रियदर्शिनी को कॉलेज उतारा। तब राजिंदर सीधे कॉलेज पहुंच गए, जहां उन्होंने संतोष को देखा। उस दिन सुबह के 11.15 बजे थे और प्रियदर्शिनी अपनी क्लास में थी।

क्लास खत्म कर वह राजिंदर के साथ घर आ गई। उसने राजिंदर से शाम 5.30 बजे तक आने को कहा। इस दौरान प्रियदर्शिनी का कुक भी अपने दोस्त विशंभर से मिलने बाहर चला गया था। कुक करीब 5 बजे घर वापस आया और कुत्ते को टहलाने बाहर चला गया। यही वो समय था जब संतोष घर में दाखिल हुआ। हालांकि उसे आते हुए कुप्पुस्वामी (पड़ोसी) ने देखा था। उस वक्त संतोष के हाथ में काले रंग का हेलमेट था।

शाम 5.30 बजे जब हेड कांस्टेबल राजिंदर सिंह प्रियदर्शिनी के घर पहुंचे तो उनके साथ कांस्टेबल देव कुमार भी थे। उन्होंने घर की घंटी बजाई लेकिन दरवाजा किसी ने नहीं खोला। कुछ देर इंतजार कर जब वो पीछे के दरवाजे से अंदर जाने लगे तो देखा कि वह पहले से ही थोड़ा खुला था। अंदर गए तो घर का जो नजारा उन्होंने देखा उसे देख दंग रह गए। उन्होंने देखा प्रियदर्शिनी का शव कमरे में बेड के नीचे पड़ा था। मुंह से खून निकला हुआ था और चारों तरफ खून ही खून फैला हुआ था। 

कमरे का मंजर देख उड़े बॉडी गार्ड के होश

यह सब देख राजिंदर के होश उड़ गए। उसने तुरंत पुलिस स्टेशन फोन किया, जिसके बाद मौके पर पूरी टीम वहां पहुंची। प्रियदर्शिनी के शव के पास टूटे हुए कांच के टुकड़े, कुछ बाल पड़े थे। जांच कर रही टीम ने सबकुछ इकट्ठा किया। जिस हीटर के तार से प्रियदर्शिनी का गला घोंटा गया था वह भी वहीं पड़ा था। उसे भी पुलिस ने कब्जे में ले लिया।

प्रियदर्शिनी के माता-पिता को अब तक इस बारे में जानकारी नहीं मिली थी। शाम 7.30 बजे जब प्रियदर्शिनी के पिता चमनलाल मट्टू और मां वापस आए तो उन्हें पता चला कि अब उनकी बेटी इस दुनिया में नहीं रही है।

प्रियदर्शिनी की मां रागेश्वरी ने सबसे पहले संतोष का नाम लिया। उन्होंने पूरी बात बताई कि कैसे संतोष उनकी बेटी को परेशान कर रहा था और उसके लिए किस हद तक पागल था। इसके बाद संतोष को पूछताछ के लिए बुलाया गया। लेकिन संतोष को पकड़ना या उसे दोषी साबित करना इतना आसान नहीं था क्योंकि संतोष के पिता खुद उस समय जम्मू-कश्मीर में आईपीएस अफसर थे और जल्द ही उनकी पोस्टिंग दिल्ली होने वाली थी।

इसी कारण से प्रिया के घरवालों को भी चिंता थी कि न्याय नहीं मिल पाएगा। प्रियदर्शिनी के घरवालों का यह डर सही भी निकला। जांच के दौरान कई ऐसी बातें हुईं जो किसी भी देश की न्याय व्यवस्था को शर्मसार करने के लिए काफी है।

पिता के रसूख का मिला संतोष को फायदा

पुलिस ने जांच के बाद अपनी रिपोर्ट में लिखा कि प्रियदर्शिनी का दुष्कर्म नहीं हुआ। रिपोर्ट में यह भी लिखा गया कि संतोष को फंसाने के लिए पहले उसका ब्लड सैंपल लिया गया और उसे प्रियदर्शिनी के अंडरवियर में डाला गया ताकि वह दोषी साबित हो सके। इस केस को सीबीआई देख रही थी। वारदात के तीन साल बाद 1999 में जज जीपी थरेजा ने संतोष को बरी कर दिया।

फैसला आते ही पूरे देश में असंतोष और उदासी की लहर दौड़ गई। इसमें गुस्सा था, बेबसी थी। दिनदहाड़े एक बेटी का कत्ल कर दिया गया और अपराधी का नाम जानते हुए भी उसे खुला छोड़ दिया गया था। उस दिन हार हुई थी न्याय की, इंसाफ की क्योंकि सबूतों और गवाहों को नजरअंदाज किया गया था।

संतोष प्रियदर्शिनी से एकतरफा प्यार में रिजेक्ट हुआ था। उसके अंदर गुस्सा था। उसे प्रियदर्शिनी के घर के अंदर जाते हुए कुप्पुस्वामी ने देखा था लेकिन उसकी गवाही नहीं हुई। संतोष के हेलमेट का शीशा प्रियदर्शिनी के शव के पास मिला था उसे भी सबूत के तौर पर नजरअंदाज किया गया। प्रिया के पूरे शरीर पर 19 वार किए गए थे और संतोष के हेलमेट पर प्रियदर्शिनी का खून था। इन सभी सबूतों के बावजूद संतोष को बरी कर दिया गया था। इसके बावजूद कुछ लोग ऐसे थे जिन्होंने हिम्मत नहीं हारी।
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आखिर जीत गया न्याय

उन्होंने जस्टिस फॉर प्रिया नाम का संगठन बनाया जिससे लोग जुड़ते गए और प्रियदर्शिनी को न्याय दिलाने की मांग तेज हुई। सीबीआई ने हाईकोर्ट में अपील की और 6 साल बाद 2006 में संतोष को दोषी ठहराया गया। यह साबित किया गया कि डीएनए टेस्टिंग में जो लिक्विड इस्तेमाल हुआ था वह सीमन था और वह प्रिया की बॉडी से मिला था और वह संतोष के ब्लड से मैच हुआ था।

अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि जांच के लिए जो इंस्पेक्टर आए थे उन्होंने कुप्पुस्वामी का बयान नहीं लिया था। जबकि स्वामी ने वारदात वाले दिन ही ये बता दिया था कि उसने संतोष को घर में अंदर जाते देखा था। इन सब से पता चलता है कि संतोष के पिता ने अपने बेटे को बचाने के लिए हर संभव प्रयास किया।

संतोष ने सजा से बचने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दोबारा अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के ऑर्डर पर स्टे लगा दिया। 6 अक्तूबर 2010 को सुप्रीम कोर्ट ने संतोष की सजा को फांसी से घटाकर उम्रकैद कर दी। उस वक्त प्रियदर्शिनी के पिता चमनलाल मट्टू ने कहा, कोर्ट से हमें ये उम्मीद नहीं थी।
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