पराली के धुएं से होने वाले प्रदूषण को रोकने लिए दिल्ली सरकार भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा की तकनीक को कारगर मान रही है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अगले दो दिनों में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री से मुलाकात कर पड़ोसी राज्यों में इस तकनीक से पराली के कुशल और प्रभावी प्रबंधन पर चर्चा करेंगे। केजरीवाल का मानना है कि तकनीकी बहुत ही सामान्य, इस्तेमाल योग्य और व्यावहारिक है।
इससे पहले अरविंद केजरीवाल बृहस्पतिवार पूसा स्थित संस्थान पहुंचे और बॉयो डि-कंपोजर तकनीक का निरीक्षण किया। केजरीवाल ने कहा कि तकनीक पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को रोकने में व्यावहारिक और काफी उपयोगी है। पूसा में विकसित कैप्सूल का घोल बना कर खेतों में छिड़का जाता है, जिससे पराली का डंठल गलकर खाद बना जाता है। इससे किसानों को खाद का इस्तेमाल भी कम करना पड़ेगा।
अरविंद केजरीवाल ने कहा कि दिसंबर में किसान मजबूरन अपने खेत में खड़ी धान की पराली जलाता है। इसके धुंए से उतर भारत के दिल्ली की आबोहवा खराब हो जाती है। जबकि पूसा ने इसके निपटान के लिए कैप्सूल विकसित किया है। चार कैप्सूल एक हेक्टेयर के लिए पर्याप्त होता है। इससे एक किसान करीब 25 लीटर घोल बना लेता है। इसमें गुड़, नमक और बेसन मिलाया जाता है।
इसके छिड़काव से पराली का मोटा व मजबूत डंठल करीब 20 दिन के अंदर मुलायम होकर गल जाता है। इसके बाद किसान अपने खेत में फसल की बुवाई कर सकता है। इससे किसान को अपने खेत में पराली जलाने की जरूरत नहीं पड़ती।
अरविंद केजरीवाल ने बताया कि वह अगले दो दिन में केंद्रीय मंत्री पर्यावरण मंत्री से मिलकर उनसे इस बारे में बात करेंगे। उनसे गुजारिश रहेगी कि वह पड़ोसी राज्यों व बात कर इस तकनीक के इस्तेमाल के लिए उनको राजी करें। केजरीवाल ने माना कि इस साल के लिए समय कम है, लेकिन अगले साल के लिए विस्तृत योजना बनाई जा सकती है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि दिल्ली सरकार इसका ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करेगी। इसके लिए पूसा इंस्टीट्यूट के साथ समझौता करेंगे।
खाद की जरूरत भी पड़ती है कम
अरविंद केजरीवाल ने बताया कि जब किसान अपने खेत में पराली जलाता है तो मिट्टी खराब हो जाती है। उसके अंदर के बैक्टीरिया व फंगस मर जाते हैं। जबकि नई तकनीक मिट्टी को उर्वर बनाएगी। स्वाभाविक तौर पर इससे खेत में खाद कम डालनी पड़ेगी। केजरीवाल के मुताबिक, कैप्सूल की कीमत बहुत ही कम है। प्रति एकड़ कितनी लागत पड़ रही है, हमें ये इसकी लागत का पूरा प्रस्ताव बना कर देंगे। हालांकि, वैज्ञानिकों का कहना है कि कैप्सूल की कीमत प्रति एकड़ करीब 150 से 250 रुपये आ रही है।