इनमें से कुछ पर काम हुआ है, कुछ पर आधा अधूरा हुआ है और मुफ्त वाई-फाई जैसे कई विषय हैं जिन पर अभी सरकार ने काम शुरू ही नहीं किया है। जल्द ही देश चुनावी मोड़ में आने वाला है और तब जनता केजरीवाल से उनके वादों के बारे में पूछेगी।
शुरू से टकराव
केजरीवाल सरकार की शुरुआत ही केंद्र सरकार और उपराज्यपाल के साथ टकराव से हुई थी। चाहे जन लोकपाल विधेयक हो या फिर मंत्रिमंडल के दूसरे फैसले, राज्य सरकार ने उपराज्यपाल को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया। इसी के बाद उनके सभी काम राजभवन में जाकर अटक जाते थे।
वापस मिली ताकत
शीला दीक्षित के पंद्रह साल के शासन और केजरीवाल के तीन साल की सरकार में मूल फर्क सिर्फ सर्विसेज (नौकरशाही) के केंद्र के पास चले जाने का था। यही वजह थी कि शीला सरकार ने हजारों करोड़ रुपये के बिजली वितरण के निजीकरण के फैसले को राजभवन की मंजूरी के लिए नहीं भेजा और तत्कालीन एलजी ने भी कोई आपत्ति नहीं जताई।
वहीं केजरीवाल के हर फैसले पर उपराज्यपाल के सवाल जवाब हो रहे थे। केजरीवाल का आरोप है कि दिल्ली सरकार की 400 से ज्यादा फाइलें एलजी के पास अटकी थीं लेकिन अब यह समस्या खत्म हो गई है।