शरीर में घूमती कैंसर कोशिकाओं की अब आसानी से पहचान हो सकेगी। इसके लिए एम्स के वैज्ञानिकों ने नई गैर-आक्रामक जांच तकनीक विकसित की है। फिलहाल इस सुविधा से स्तन कैंसर की पहचान हो सकेगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर की कई कोशिकाएं एक जगह पर मिलकर रोग को जटिल बनाती हैं। यह कोशिकाएं शरीर में घूमती रहती हैं। इसमें कैंसर बनने के दौरान कई बदलाव आते हैं। इसकी पहचान के लिए एक अध्ययन किया गया जिसमें करीब 100 मरीजों को शामिल किया गया। उसमें पता चला कि बिना चीरफाड़ किए नवीन तकनीक से स्तन कैंसर की प्रारंभिक पहचान की जा सकती है।
एम्स के बायोफिजिक्स विभाग व मेडिकल ऑन्कोलॉजी के विशेषज्ञ अभय मिश्रा ने बताया कि इस शोध को प्रो. सरोज कुमार, डॉ. पीयूष रंजन के नेतृत्व में अतुल बत्रा के सहयोग से किया गया। इस अध्ययन में रक्त प्लाज्मा में पाए जाने वाले छोटे कण (स्मॉल एक्स्ट्रासेल्यूलर वेसीकल्स) का विश्लेषण किया गया। इन वेसीकल्स में मौजूद लिपिड्स की संरचना को इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीक से जांचा गया।
शोध में 104 मरीज शामिल
इस शोध में स्तन कैंसर के 74 और 30 स्वस्थ्य मरीजों को शामिल किया गया। शोध प्लाज्मा से प्राप्त स्मॉल एक्स्ट्रासेल्यूलर वेसीकल्स की एफटीआईआर (फुरियर ट्रांसफॉर्म इन्फ्रारेड) स्पेक्ट्रोस्कोपी के माध्यम से विश्लेषण पर केंद्रित है। इसमें दोनों समूह के मरीजों के नमूनों से स्मॉल एक्स्ट्रासेल्यूलर वेसीकल्स को अलग किया गया।
उनके आकार व प्रोटीन मार्कर्स (टीएसजी101, सीडी9, सीडी81, सीडी63) की पुष्टि टीईएम, एनटीए और वेस्टर्न ब्लॉटिंग के माध्यम से की गई। शोध में लिपिड्स के विशिष्ट पैटर्न के आधार पर कैंसरग्रस्त और स्वस्थ व्यक्तियों के बीच अंतर पाया गया। यह तकनीक मौजूदा जांच की तुलना में ज्यादा सटीक, सुलभ और प्रारंभिक चरण में निदान के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।
ठीक होने के बाद भी हो सकता है कैंसर
डॉक्टरों का कहना है कि शरीर के एक हिस्से में कैंसर ठीक होने के बाद दूसरे हिस्से या मौजूदा जगह पर फिर से कैंसर होने की आशंका रहती है। यदि इसकी जांच समय पर हो जाए तो उक्त जगह की पहचान कर रोग का इलाज किया जा सकता है।
- देश में हर साल स्तन कैंसर के दो लाख नए मामले सामने आते हैं। इनमें से अधिकतर मरीज एडवांस स्टेज में अस्पताल पहुंच पाती हैं। इनमें से हजारों महिलाएं इलाज के दौरान दम तोड़ देती हैं