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कैसे मिले आशियाना-4: आईटी और कॉरपोरेट के आने से मिला रियल एस्टेट को बूम

Fri, 22 Apr 2016 11:39 AM IST
यशलोक सिंह/अमर उजाला, गुड़गांव

सार

  • हरियाणा सरकार के मास्टर प्लान ने इसकी नींव को दी मजबूती
  • वर्ष 2004-05 में रियल एस्टेट सेक्टर क्षेत्र में आई क्रांति
  • इस अवधि में सरकार ने आसानी से जारी किया था सीएलयू
  • तभी से इस क्षेत्र में संकट के बादल घिरना हो गए थे शुरू
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- फोटो : Reuters
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विस्तार
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वैसे तो साइबर सिटी में रियल एस्टेट की नींव वर्ष 1997-98 की अवधि में डलनी शुरू हो गई थी। मगर इसमें बूम 2004-05 से आरंभ हुआ, क्योंकि इस दौरान बिल्डरों को प्रदेश सरकार द्वारा आसानी से चेंज ऑफ लैंड यूज (सीएलयू) मिल रहा था।
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बैंकों ने भी लोन देने की प्रक्रिया को भी काफी उदार कर दिया था। खरीददारों से लेकर बिल्डरों तक को कम ब्याज दर पर लोन ने इस क्षेत्र की प्रगति में विशेष भूमिका निभाई। आईटी-बीपीओ, कॉरपोरेट और इंडस्ट्री के बढ़ते दायरे ने रियल एस्टेट को गतिमान बना दिया है। प्रदेश सरकार के मास्टर प्लान ने इसे और संजीवनी दे दी। इसी समय से इस क्षेत्र में संकट के बादल भी घिरने लगे थे।

रियल एस्टेट सेक्टर से जुड़े और इसके जानकारों का कहना है कि इस क्षेत्र में क्रांति का सिलसिला असल मायने में 2004-05 में शुरू हुआ। इसी अवधि के बाद यहां प्रॉपर्टी के रेट दो गुना, तीन गुना और चार गुना के स्तर पर पहुंच गए और इसका किसी को पता भी नहीं चला। एक समय ऐसा था जब हुडा सेक्टरों में ड्रॉ निकलने के बाद लोग प्लाट लेने को आगे नहीं आते थे।
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मगर अब हर किसी का सपना गुड़गांव में प्लॉट, फ्लैट और घर होना है। यही कारण है कि हजारों की संख्या में ऐसी इच्छा वाले लोग बिल्डरों के चंगुल में बुरी तरह से फंस गए हैं। बिल्डरों ने उन्हें बड़े-बड़े सपने दिखाकर दोराहे पर खड़ा कर दिया है।

रियल एस्टेट विशेषज्ञ संजय शर्मा का कहना है कि गुड़गांव में लोगों के आशियाने पर संकट के बादल की नींव 2004-05 में ही डल गई थी। जब प्रदेश सरकार बिल्डरों को सीएलयू आसानी से देने लगी और उनसे सीवरेज, ड्रेनेज, पावर व वाटर व्यवस्था के बारे में कुछ नहीं पूछा। यही कारण है कि जिस फ्लैट में कब्जा लोगों को मिला, वहां कई परेशानियां हैं। लोगों को इसके लिए सड़क पर उतरना पड़ रहा है।

उन्होंने बताया कि 2006-07 में प्रदेश सरकार का मास्टर प्लान 2021 आया। इसके बाद यहां बिल्डरों की बाढ़ सी आ गई। इन्होंने निवेशकों को यहां ग्रेटर दिल्ली का सपना दिखाया। इसी का परिणाम रहा कि घरों के खरीददार गुड़गांव की ओर भागने लगे। बिल्डरों ने धड़ाधड़  बुकिंग शुरू कर दी। तब से आज तक हजारों खरीददार बिल्डरों के इर्द-गिर्द चक्कर लगा रहे हैं। बड़ी संख्या में ऐसे बिल्डर भी हैं, जिनका प्रोजेक्ट आज तक पूरा नहीं हुआ। इसी मास्टर प्लान के अंतर्गत गुड़गांव में सेक्टर-1 से 57 तक का विकास हुआ। जहां समस्याओं का अंबार है।

वर्ष 2009 तक रियल एस्टेट की बढ़त का दौर
अपनी आंखों के सामने गुड़गांव को बढ़ता हुआ देखने वाले बीडी पाहूजा बताते हैं कि 25 वर्ष पहले यहां कुछ भी नहीं था। डीएलएफ फेज-1, 2 व 3 बसने के बाद यहां रियल एस्टेट का ऐसा बूूम आया जो हर किसी को अपनी ओर बहाता ले गया। प्रॉपर्टी के रेट कब दो गुने, तीन गुने और चार गुने हुए पता ही नहीं चला। आईएमटी मानेसर और उद्योग विहार बसने के बाद तो इस सेक्टर में और तेजी आ गई। वर्ष 2009 तक रियल एस्टेट सेक्टर का स्वर्णिम काल है। 2009 के बाद मंदी आने लगी। जो अब काफी भयंकर हो गई है।

बिल्डरों ने देखा सिर्फ अपना फायदा
बिल्डरों ने अपनी हाउसिंग परियोजनाओं में सिर्फ अपना लाभ देखा। खरीददारों को घर का सपना दिखाकर बिल्डर उनको निचोड़ रहे हैं। उन्होंने साइटों पर काम बंद कर रखा है। पूछने पर जवाब मिलता है कि उनके पास फंड नहीं है। अब तो जवाब भी नहीं देते। छोटे-मोटे बिल्डर की बात तो दूर बड़े-बड़े नाम वाली रियल एस्टेट कंपनियां यहां खरीददारों को धोखा दे रही हैं। सरकार भी इन पर अंकुश लगाने में नाकाम साबित हो रही है। निवेशकों को सड़क पर उतरकर आए दिन प्रदर्शन करना पड़ रहा है।-हिमांशु दूबे (कोर ग्रुप सदस्य, सनब्रिज अपार्टमेंट बायर्स वेलफेयर एसोसिएशन)

गुड़गांव में बिल्डर एक साथ कई प्रोजेक्ट शुरू कर देते हैं। नतीजा यह होता है कि वह अपने किसी भी प्रोजेक्ट पर ध्यान नहीं दे पाते। इसका खामियाजा खरीददारों को झेलना पड़ता है। लोगों को घर का किराया और ईएमआई एक साथ देना पड़ रहा है। बिल्डरों ने हैसियत से अधिक जमीन ले ली और उस पर परियोजना शुरू कर दी। मगर इसे पूरा करने में वह सक्षम नहीं हो पा रहे हैं।-उमेश सपरा (निवेशक, एमराल्ड हिल्स प्रोजेक्ट सेक्टर-65)

अपना मंच
रहेजा के सेक्टर-92 स्थित रिहायशी परियोजना नवोदया में वर्ष 2009 में बुकिंग कराई थी। जिसकी डिलेवरी तीन साल में करनी थी। मगर अभी तक ऐसा नहीं हुआ है। मकान का किराया और ईएमआई देना भारी पड़ रहा है। अगर बिल्डर को पैसे देने में देरी होती है तो वह 18 से 24 प्रतिशत पेनाल्टी लगाता है। प्रोजेक्ट इसकी भरपाई वह करने को तैयार नहीं है। ऐसे में बिल्डर पर भी चार्ज लगना चाहिए।-रचित अग्रवाल

एमटेक के प्रोजेक्ट में फ्लैट 2006 में बुक कराया था, अब 2016 चल रहा है, वहां बिल्डर से सिर्फ ढांचा खड़ा कर दिया है। काम बंद है। पूछने पर कभी तीन माह तो कभी छह माह की बार-बार मोहलत मांगता है।-रविन्द्र कौर

ईएमार एमजीएफ के प्रोजेक्ट में निवेश किया था। 2012 में इसे पूरा होना था। मगर आज तक बिल्डर काम पूरा नहीं कर पाया। अभी आधा ही काम हुआ है। परियोजना के एंबर और कोरल ब्लॉक में तो काम भी नहीं शुरू हुआ।-रमा चालवा

गुड़गांव के सेक्टर-65 की एक एमजीएफ हाउसिंग परियोजना में निवेश किया है। मगर अभी तक यह काम पूरा नहीं हुआ। अभी इसमें कितना समय लगेगा बिल्डर ठीक से नहीं बता रहा। बार-बार वह समय मांगता है। इसके लिए सड़क पर उतर निवेशकों को प्रदर्शन भी करना पड़ा।-एसपी मलहोत्रा

यूनिटेक  एस्केप परियोजना के अंतर्गत 2006 में फ्लैट बुक कराया। 95 फीसदी भुगतान भी कर दिया है। इसके बावजूद अभी तक पजेशन नहीं मिला। इससे निवेश करने वाले सभी परेशान हैं।-अरविंद
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