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समन जारी करना गंभीर प्रक्रिया, आदेश में न्यायिक विवेक का हो प्रमाण : हाईकोर्ट

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98 लाख रुपये की कथित धोखाधड़ी के मामले में जारी समन आदेश को किया रद्द
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संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने 98 लाख रुपये की कथित धोखाधड़ी के मामले में एक व्यक्ति के खिलाफ जारी समन को रद्द कर दिया। अदालत ने समन रद्द करते हुए कहा कि समन जारी करना कोई औपचारिकता नहीं बल्कि एक गंभीर प्रक्रिया है, जिसमें न्यायिक विवेक और तथ्यों का समुचित परीक्षण आवश्यक है। न्यायमूर्ति अमित महाजन की एकल पीठ ने कहा कि यदि समन आदेश में केवल तथ्यों का उल्लेख कर प्रथम दृष्टया संतोष व्यक्त कर दिया जाए, लेकिन उसके पीछे कोई ठोस कारण या विश्लेषण न दिया गया हो, तो वह आदेश उचित नहीं माना जा सकता।
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धोखाधड़ी का यह मामला इंडिया बुल्स सिक्योरिटीज लिमिटेड की तरफ से की गई शिकायत से जुड़ा है। इसमें कंपनी ने आरोप लगाया था कि संबंधित व्यक्ति ने धोखे से अपने नाम से ट्रेडिंग खाता खुलवाया और मार्जिन ट्रेडिंग की सुविधा का लाभ उठाते हुए बड़ी मात्रा में शेयर खरीदे, लेकिन भुगतान नहीं किया। हालांकि, आरोपी ने उच्च न्यायालय में दायर याचिका में दावा किया कि कंपनी ने उसकी अनुमति के बिना ही उसके सात करोड़ रुपये के शेयर बेच दिए, जिससे उसे नुकसान हुआ। उसने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट ने समन जारी करने से पहले शिकायत और साक्ष्यों की समुचित समीक्षा नहीं की और बिना सोच-विचार के आदेश पारित कर दिया। अदालत ने माना कि प्रथम दृष्टया आरोपों में कोई आपराधिक तत्व नहीं है। ऐसे में एक वरिष्ठ नागरिक के खिलाफ आपराधिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। अदालत ने कहा कि केवल अनुबंध के उल्लंघन से धारा 420 (धोखाधड़ी) का मामला नहीं बनता। जब तक यह सिद्ध न हो कि आरोपी ने वादा करते समय ही बेईमानी की मंशा से काम किया हो।
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