इस बारे में एम्स के डॉ. आरपी सेंटर की प्रोफेसर डॉ. भावना चावला ने बताया कि पांच साल से कम उम्र के बच्चों में रेटिनो ब्लास्टोमा (आंखों का कैंसर) के मामले पाए जाते हैं। यदि समय पर इसका इलाज कर दिया जाए तो बच्चे की जांच के साथ उसकी नजर के साथ आंखों को भी बचाया जा सकता है। पहले रेटिनो ब्लास्टोमा का पता काफी एडवांस स्टेज में चलता था, उस समय सर्जरी करके ट्यूमर के साथ पूरी आंख को निकालना पड़ता था। इसके बाद कीमोथेरेपी होती थी। अब कई नई थेरेपी आ गई हैं जिससे आंखों के साथ नजर को भी बचाया जा सकता है। इस कीमोथेरेपी और रेडिएशन थेरेपी की मदद से आंख को बचा सकते हैं। यह सुविधा केंद्र सरकार के सहयोग से एम्स में मुफ्त उपलब्ध है।
एम्स ने बार्क के साथ मिलकर प्लाक ब्रेकीथेरेपी बच्चों के लिए शुरू की है। इस स्वदेशी थेरेपी की मदद से आंख और नजर बचाई जा सकती है। इस थेरेपी में प्लाक को सर्जरी कर आंख पर फिक्स कर दिया जाता है और इसी से रेडियोथेरेपी दी जाती है। थेरेपी के बाद इसे हटा दिया जाता है। 3-4 बच्चों पर इसका इस्तेमाल किया गया तो परिणाम बेहतर आए। रेटिनो ब्लास्टोमा से बचाव के लिए एम्स में शुक्रवार को वॉकथान का आयोजन किया गया। इसमें पीड़ित बड़े बच्चे भी आए जिनका लंबे समय पहले एम्स में उपचार हुआ और वह अब पूरी तरह से ठीक हैं। इनमें से एक बच्चा कलाकृति बना रहा है।
एम्स में हर माह आते हैं 40 बच्चे
एम्स में रेटिनो ब्लास्टोमा से पीड़ित हर माह 35 से 40 मरीज आते हैं। एम्स नॉर्थ इंडिया का सबसे बड़ा केंद्र है। यहां जम्मू-कश्मीर, नार्थ ईस्ट, मध्यप्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, नेपाल सहित अन्य क्षेत्रों से बड़ी संख्या में बच्चे उपचार के लिए आते हैं। एम्स में इस बीमारी का उपचार पूरी तरह से मुफ्त है।
इन्हें देनी पड़ती है थेरेपी
डॉ. भावना बताया कि स्वदेशी प्लाक ब्रेकीथेरेपी उन बच्चों को दी जाती है जिनमें कीमोथेरेपी नाकाम रही है या यह तकनीक काम नहीं कर रही हो। इसके अलावा जिन बच्चों दिख रहा है उसे बचाया जा सकता है। वहीं, ऐसे बच्चे जिसकी पहले से एक आंख निकाल दी गई हो और दूसरी आंख को बचाना हो।