- जेएनयू में हिंद महासागर राष्ट्र समूह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की शुरुआत
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के कन्वेंशन सेंटर में शुक्रवार से दो दिवसीय छठे हिमालय-हिंद महासागर राष्ट्र समूह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ हुआ। इसका आयोजन हिंद महासागर राष्ट्र समूह, राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच, जामिया मिल्लिया इस्लामिया सहित कई दूसरे केंद्रों के सहयोग से किया जा रहा है। सम्मेलन का केंद्रीय विषय भारत की हिंद महासागर क्षेत्र में भू-राजनीतिक एवं सामरिक महत्ता है।
सम्मेलन में मुख्य वक्ता हिंद महासागर राष्ट्र समूह के मुख्य संरक्षक डॉ. इंद्रेश कुमार ने कहा कि भारत की मूल भावना विश्वबंधुत्व और वसुधैव कुटुम्बकम् पर आधारित है। यहां समस्त मानवता को भाई-बहन के रूप में देखने की दृष्टि है। अगर समाज आपसी सम्मान, करुणा और सहयोग की भावना से जीना सीख ले तो संघर्ष और हिंसा कम हो सकती हैं। भाई का कर्तव्य है बहन का सम्मान करना और बहन का कर्तव्य है भाई के कल्याण की कामना करना। यही संबंध विश्वशांति की आधारशिला बन सकता है।
भारत ने सदैव शक्ति के स्थान पर संवाद, संतुलन और सहयोग का मार्ग अपनाया है। आज भी वैश्विक तनावों के बीच भारत शांति, स्थिरता और समानता पर आधारित एक वैकल्पिक मार्ग प्रस्तुत कर रहा है। विश्व में स्थायी शांति तभी संभव है जब राष्ट्र प्रतिस्पर्धा के बजाय सह-अस्तित्व और सम्मान की नीति अपनाएं।
जामिया के कुलपति प्रो. मजहर आसिफ ने कहा कि किसी भी सभ्यता की वास्तविक शक्ति उसके संवाद और संदेश की क्षमता में निहित होती है। भारत की संस्कृति ने सदैव संवाद को संघर्ष पर वरीयता दी है। यही उसकी वैश्विक स्वीकृति का आधार रहा है।
वहीं लेफ्टिनेंट जनरल (डॉ.) अरविंदर सिंह लांबा ने कहा कि भारतीय महासागर केवल भौगोलिक इकाई नहीं बल्कि सामरिक केंद्रीयता का प्रतीक है। भारत की स्थिति इस क्षेत्र में उसे कूटनीतिक और सामरिक बढ़त प्रदान करती है। आने वाले समय में समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक व्यापार की दृष्टि से इस क्षेत्र का महत्व और बढ़ेगा।