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विदेश में रहने वाले भारतीयों का पासपोर्ट शुल्क बढ़ाना गलत नहीं: हाई कोर्ट

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14 साल बाद 67 प्रतिशत की बढ़ोतरी को अदालत ने माना उचित, याचिका खारिज
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नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने विदेशों में रहने वाले भारतीयों के पासपोर्ट शुल्क में बढ़ोतरी के केंद्र सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि 14 साल बाद शुल्क में 67 प्रतिशत की बढ़ोतरी को अनुचित या बहुत ज्यादा नहीं कहा जा सकता। पासपोर्ट शुल्क तय करना सरकार की नीति का हिस्सा है और इसमें अदालत के दखल की जरूरत नहीं है।
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कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नितिन वासुदेव सांबरे और न्यायमूर्ति संजय शर्मा की पीठ ने कहा कि सरकार ने इससे पहले साल 2012 में पासपोर्ट शुल्क बढ़ाया था। इतने लंबे समय बाद की गई बढ़ोतरी को गलत नहीं ठहराया जा सकता। अदालत प्रवासी लीगल सेल की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में कहा गया था कि भारत में रहने वाले लोगों को पासपोर्ट बनवाने के लिए करीब 2,500 रुपये देने पड़ते हैं, जबकि विदेशों में रहने वाले भारतीयों को करीब 11,900 रुपये चुकाने पड़ रहे हैं। पहले यह शुल्क करीब 7,000 रुपये था। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि खाड़ी देशों में काम करने वाले कम आय वाले भारतीय श्रमिकों, जैसे मैकेनिक, प्लंबर और निर्माण मजदूरों के लिए बढ़ा हुआ शुल्क देना मुश्किल है। हालांकि, अदालत ने सवाल उठाया कि इन श्रमिकों की आर्थिक स्थिति का प्रमाण कैसे जुटाया जाएगा। पीठ ने कहा कि जब तक शुल्क बहुत अधिक और अनुचित नहीं है, तब तक अदालत को सरकार के नीतिगत फैसलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। इसके बाद याचिका खारिज कर दी गई। संवाद
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