अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। रोहिणी कोर्ट में एक अनोखा मामला सामने आया है। यहां न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी रोहित कुमार ने एक संपत्ति विवाद मामले में जमानत देते हुए अपने फैसले में कविता जंग-ए-मिल्कियत लिखी। यह कविता संपत्ति विवादों के बीच पारिवारिक रिश्तों के टूटने पर गहरी चिंता व्यक्त करती है। कविता की एक पंक्ति, मिल्कियत की जंग में न जाने कितने अफसाने हुए, कुछ ही अपने थे, वो भी अब बेगाने हुए, सामाजिक मुद्दे को प्रभावी ढंग से उजागर करती है।
नितिन सोनी पर अपनी मां की संपत्ति पर अवैध कब्जे का आरोप था। आरोप था कि नितिन ने ताला तोड़कर संपत्ति पर कब्जा किया और अपनी मां पर हमला किया। हालांकि, कोर्ट ने सीसीटीवी फुटेज और फोटोग्राफ्स में पाया कि नितिन पहले से ही उस संपत्ति पर काबिज था। अभियोजन पक्ष के पास यह साबित करने का कोई ठोस सबूत नहीं था कि नितिन ने ताला तोड़ा था। नितिन के वकील ने दावा किया कि मां ने मौखिक समझौते के तहत संपत्ति उन्हें सौंप दी थी। एक वसीयत के अनुसार नितिन उसका पूर्ण मालिक है। न्यायाधीश ने इन तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए नितिन सोनी को जमानत दे दी। इस दौरान न्यायिक मजिस्ट्रेट ने कविता के माध्यम से संपत्ति विवादों के सामाजिक प्रभावों पर भी प्रकाश डाला।
कविता: जंग ए मिल्कियत
मिल्कियत की जंग में ना जाने कितने अफ़साने हुए,
कुछ ही अपने थे, वो भी अब बेगाने हुए।
बन के कृष्ण, अब किसी को आना होगा,
सड़ते, लड़ते, बिगड़ते रिश्तों को बचाना होगा।
न जाने ये जंग और कितनी महाभारत लाएगी,
आख़िर कितनों को सलाखों तक ले जाएगी।
बनकर बेटी, रिश्तों को बचाना होगा,
सभी नातों को निभाना होगा।
क्या रखा है इस जंग में, कोई बताएगा,
आख़िर इस धरती से कौन क्या ही ले जाएगा।