दिल्ली में चप्पे-चप्पे पर लगे कैमरे न सिर्फ चेहरों की पहचान करेंगे बल्कि एआई आधारित निगरानी तंत्र से 5 करोड़ लोगों की पूरी कुंडली भी बता देंगे। राजधानी में तेजी से बढ़ रहे कैमरों का नेटवर्क कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी तंत्र से जुड़ रहा है। इससे यह फायदा होगा कि पुलिस चेहरे और वाहन की नंबर प्लेट की पहचान कर बहुत कम समय में संदिग्ध व्यक्ति तक पहुंच बना सकती है।
व्यावसायिक समाचार मंच द केन की एक महीने लंबी जांच रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली पुलिस करीब 857 करोड़ रुपये के ‘सेफ सिटी प्रोजेक्ट’ विकसित कर रही है। रिपोर्ट के लिए कम से कम 20 पुलिस अधिकारियों, तकनीकी सेवा प्रदाताओं और सलाहकारों से बातचीत तथा परियोजना से जुड़े आधिकारिक दस्तावेज की समीक्षा की गई।
रिपोर्ट के अनुसार, इस निगरानी व्यवस्था की खासियत केवल कैमरों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि अलग-अलग सरकारी रिकॉर्ड को आपस में जोड़कर किसी व्यक्ति की पहचान और पृष्ठभूमि तलाशने की क्षमता बढ़ानी है। पुलिस क्लीयरेंस प्रमाणपत्र, आपराधिक न्याय व्यवस्था, मतदाता पहचान पत्र, वाहन पंजीकरण और ड्राइविंग लाइसेंस से जुड़े डाटाबेस इस तंत्र से जोड़े गए हैं।
विधानसभा की घटना में दो घंटे में पकड़ा गया आरोपी
इस तकनीक की उपयोगिता का एक उदाहरण अप्रैल में दिल्ली विधानसभा के बाहर सामने आया। द केन के अनुसार 37 वर्षीय एक व्यक्ति सफेद टाटा सिएरा लेकर विधानसभा के प्रवेश द्वार पर सुरक्षा बैरिकेड से टकराकर अंदर पहुंच गया। वह वाहन से उतरा और विधानसभा अध्यक्ष की खड़ी कार में गुलदस्ता रखने जैसी हरकत करने के बाद वहां से भाग गया। पुलिस ने उसे दो घंटे से भी कम समय में पकड़ लिया। विधानसभा से करीब चार किमी दूर पुलिस पिकेट पर सिएरा को रोका गया और चालक को हिरासत में ले लिया गया। रिपोर्ट के मुताबिक इस कार्रवाई में सेफ सिटी प्रोजेक्ट से मिली तकनीकी मदद महत्वपूर्ण रही।
अब एक ही जगह जमा हो रही पहचान की कई परतें
द केन की रिपोर्ट के मुताबिक, इस पूरे तंत्र में तस्वीरों, वीडियो और व्यक्तिगत तथा बायोमेट्रिक जानकारी का बड़ा संग्रह तैयार हो रहा है। करीब 40 लाख व्यक्तियों से संबंधित ऐसा डेटा उपलब्ध बताया गया है और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। इसका दायरा केवल अपराधियों तक सीमित नहीं है। मतदाता पहचान पत्र रखने वाले, ड्राइविंग लाइसेंसधारी या वाहन पंजीकृत कराने वाले लोग भी संबंधित सरकारी रिकॉर्ड में मौजूद हैं। इसी तरह किरायेदारों और घरेलू कामगारों के पुलिस सत्यापन से जुड़ी जानकारी भी इस व्यापक डाटा ढांचे का हिस्सा बन सकती है।
- पुलिस क्लीयरेंस प्रमाणपत्र या चरित्र प्रमाणपत्र के लिए आवेदन करने वालों का रिकॉर्ड भी पहचान संबंधी सूचनाओं को जोड़ने में इस्तेमाल किया जा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार देश में कहीं दर्ज अदालती मामले से जुड़े रिकॉर्ड भी किसी व्यक्ति की पहचान और पृष्ठभूमि तलाशने की प्रक्रिया में सामने आ सकते हैं।
कैमरे से डाटाबेस तक कुछ सेकंड का सफर
इस व्यवस्था को तकनीकी आधार देने में जापान की प्रौद्योगिकी कंपनी एनईसी और गुरुग्राम स्थित अवीरोस की भूमिका है। रिपोर्ट के अनुसार एनईसी सिस्टम इंटीग्रेटर के रूप में काम कर रहा है, अवीरोस कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित वीडियो विश्लेषण, चेहरे की पहचान और तस्वीर के आधार पर खोज जैसे अनुप्रयोग उपलब्ध करा रही है।
अवीरोस का अन्वेषण नामक रिवर्स इमेज सर्च इंजन किसी तस्वीर के आधार पर उपलब्ध डाटाबेस में संभावित मिलान तलाशने में मदद करता है। एनसीसी चेहरे की पहचान तकनीक (फेशियल रिकॉग्निशन), कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डाटा विश्लेषण, साइबर सुरक्षा, दूरसंचार और नेटवर्किंग, सरकारी आईटी प्रणालियां मदद कर रही।