अपोलो अस्पताल के डॉक्टरों ने जन्म से बधिरता से ग्रस्त एक बच्चे इम्प्लांट सर्जरी की है। जिसके बाद 8 माह का बच्चा सुनने लगा है। डॉक्टरों के मुताबिक एन-7 डिवाइस से युक्त इम्प्लांट का इस्तेमाल करने वाला यह देश में सबसे कम उम्र का मरीज है। फिलहाल बच्चा कुछ जरूरी थेरेपी ले रहा है। वह पहले से स्वस्थ है।
राजधानी के पंजाबी बाग निवासी एक परिवार का बच्चा जन्म से ही बधिरता से ग्रस्त था। उसके दोनों कानों में सुनने की क्षमता नहीं थी। माता-पिता उसे इलाज के लिए इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल लेकर आए।
अस्पताल के डॉ. अमित किशोर ने बताया कि बच्चे की बोलने और सुनने की क्षमता को लेकर मेडिकल टेस्ट किए गए। इसके बाद सुनने की क्षमता को लेकर कुछ अन्य तकनीक पर भी जोर दिया, लेकिन असफलता मिलने के बाद डॉक्टरों ने बच्चे को इम्प्लांट के जरिये सुनने की क्षमता विकसित करने का निर्णय लिया।
डॉ. अमित किशोर ने बताया कि इतनी कम उम्र में अगर किसी बच्चे को ठीक से सुनाई न दे तो जल्द से जल्द इलाज करना बहुत जरूरी होता है। इस बच्चे के मामले में कॉक्लियर इम्प्लांट की मदद से ही ऐसा संभव था।
इस तरह होता है इम्प्लांट
बधिरता को दूर करने के लिए एक विदेशी कंपनी ने कुछ समय पहले ही कॉक्लियर नाम से इम्प्लांट तैयार किया था। इसके जरिये सुनने की क्षमता वापस लाई जा सकती है। इसके लिए डॉक्टर कान के पीछे सिर में एक सर्जरी के जरिये प्लेट को चस्पा करते हैं। इसके बाद एक रिमोट की तरह काम करने वाला यंत्र बाहर की ओर लगाना पड़ता है। इसे बिजली के स्विच की तरह ऑन-ऑफ भी किया जा सकता है। इम्प्लांट के प्रकार भी कई हैं। इस केस में डॉक्टरों ने आठ माह के बच्चे को न्यूक्लियस-7 नई तकनीक से तैयार इम्प्लांट लगाया है।