दिल्ली हाईकोर्ट में बृहस्पतिवार को केंद्र सरकार और वक्फ बोर्ड ने दलील दी थी कि जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी द्वारा अपने पुत्र को नायब इमाम और उत्तराधिकारी बनाने के लिए आयोजित समारोह की कोई कानूनी मान्यता नहीं है।
हाईकोर्ट को यह जानकारी देते हुए वक्फ बोर्ड ने इस प्रकार का रवैया अपनाने पर बुखारी के खिलाफ कार्रवाई करने का भी तर्क रखा। इस मुद्दे पर अदालत ने शुक्रवार को फैसला देते हुए कहा कि वह इस मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
कोर्ट ने अपने फैसले में निम्न मुख्य बातों की ओर संकेत किया...
कोर्ट ने मामना कि केंद्र सरकार और वक्फ बोर्ड यह कहना कि इमाम बुखारी द्वारा अपने बेटे की दस्तरबंदी गैरकानूनी है बिल्कुल सही है।हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि यह उनका व्यक्तिगत मामला है इसलिए उसे रोका नहीं जा सकता।कोर्ट ने वक्फ बोर्ड को फटकार लगाते हुए कहा कि इतने समय से उसने इस मामले के खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठाई। चूंकि इमाम बुखारी लंबे समय से जामा मस्जिद में रहे हैं ऐसे में उन्हें किसी व्यक्तिगत कार्यक्रम को करने से रोका नहीं जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश जी रोहिणी और न्यायमूर्ति आरएस एंडला की खंडपीठ के समक्ष बृहस्पतिवार को केंद्र सरकार और वक्फ बोर्ड ने शाही इमाम के खिलाफ कड़ा रवैया अपनाया था। दोनों ने स्पष्ट कर दिया कि जामा मस्जिद, शाही इमाम की निजी संपत्ति नहीं है और वह वक्फ बोर्ड के कर्मचारी के तौर पर मस्जिद में धार्मिक रीतियों को पूरा करते हैं।
जामा मस्जिद का पूरा स्वामित्व व प्रशासनिक जिम्मा वक्फ बोर्ड का है। उन्होंने इमाम द्वारा पुत्र को नायब इमाम बनाने के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान यह तर्क रखा। इसी के साथ 22 नवंबर को उत्तराधिकारी घोषित करने संबंधी कार्यक्रम पर भी सवाल उठने गया था।
हालांकि कोर्ट ने अपने फैसले ने यह बात भी कही है कि जामा मस्जिद के नायब की नियुक्ति और उसे व्यक्तिगत संपत्ति बनाए जाने का आरोप गंभीर है जिस पर विचार करने के लिए कोर्ट ने वक्फ बोर्ड और सरकार से अपना पक्ष विस्तार से रखने को कहा है। इससे साफ है कि जामा मस्जिद में भले ही कल होने वाली दस्तरबंदी की प्रक्रिया पर रोक नहीं लगी है लेकिन कोर्ट ने इस मामले को पूरी तरह से खारिज नहीं किया और इसपर सुनवाई आगे भी जारी रहेगा।