एक तरफ पिता की दर्दनाक मौत का गम। नफरत भरे हमले में घायल हुए भाई के जख्म भरने की चिंता तो दूसरी तरफ देश और समाज के प्रति जिम्मेदारी का सवाल। सरताज इसे लेकर किसी दुविधा में नहीं दिखते।
वो साफ़ तौर पर कहते हैं, "ये मेरा मुल्क है और इसके प्रति मेरी जिम्मेदारी बनती है। मैं इसकी सेवा ऐसे ही करता रहूंगा, जैसे मैं करता रहा हूं।" सरताज दिल्ली के करीब ग्रेटर नोएडा के दादरी इलाके में उग्र भीड़ के हाथों मारे गए इकलाख अहमद के बेटे हैं और भारतीय वायुसेना में कार्यरत हैं।
इकलाख की गोमांस खाने के संदेह में उनके गांव बिसाहड़ा में पीट-पीट कर हत्या कर दी गई थी। इस हमले में इकलाख के एक बेटे भी घायल हो गए थे जिनका इलाज चल रहा है।
'आदमी की कमी पूरी नही हो सकती'
इस घटना के बाद देश और समाज के प्रति अपने नजरिए के सवाल पर सरताज ने बीबीसी से कहा, "उन लोगों के खिलाफ तो मेरा नजरिया बदला है जिन्होंने इस वारदात को अंजाम दिया है। मैं सरकार से अपील करूंगा कि जो इसमें दोषी हैं उनको सख्त सजा दे।"
लेकिन देश, समाज और सेना को लेकर अपनी जिम्मेदारी को लेकर वो अब भी पहले जैसा जज़्बा होने की बात करते हैं। पिता की मौत के बाद सरताज और उनके परिवार को हर तरफ से मदद का आश्वासन मिल रहा है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके परिवार को मुआवज़े के तौर पर 45 लाख रुपए दिए हैं। सरताज कहते हैं, "मदद का आश्वासन एक आदमी की कमी की भरपाई कभी नहीं कर सकता।
वो किसी का भाई था। किसी का बाप था। किसी का पति था, कोई वो कमी पूरी नहीं कर सकता। उसके प्यार की भरपाई किसी की मदद से नहीं हो सकती।"
'बच सकते थे इकलाख'
सरताज का कहना है कि जब उनके घर पर हमला हुआ तो पड़ोसियों और पुलिस ने उनके पिता को बचाने की कोशिश नहीं की। वो कहते हैं कि अगर ऐसी कोशिश हुई होती तो मुमकिन था कि उनके पिता की जान बच जाती।
वो कहते हैं, "मैं मानता हूं कि उन्हें बचाया जा सकता था। अगर सारे पड़ोसी साथ देते तो ये घटना टल सकती थी। दूसरा ये है कि अगर पुलिस थोड़ा जल्दी पहुंच जाती और हालात को समझते हुए भीड़ पर नियंत्रण कर लेती तो शायद चांस थे कि बच जाते।"
सरकार से मिले सुरक्षा के आश्वासन के बाद भी सरताज अब अपने परिवार को बिसाहड़ा गांव में नहीं रखना चाहते। वो कहते हैं, "बड़े होने के नाते मेरी ज़िम्मेदारी बनती है कि मैं परिवार की सुरक्षा की तरफ ध्यान दूं।
मैं देश की सेवा के लिए बाहर रहता हूं तो मेरी जिम्मेदारी बनती है कि मैं उनको किसी सुरक्षित स्थान पर रखूं। जिस मैं सुरक्षित समझता था, वहां मेरे पिता की मौत हो चुकी है।"
'मीडिया का शुक्रिया'
सरताज का कहना है कि उनके पिता की मौत को एक सबक के तौर पर लिया जाना चाहिए. वो कहते हैं कि इस घटना के बाद सरकार को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिससे किसी और के साथ ऐसा न हो।
सरताज कहते हैं, "मैं मीडिया का शुक्रगुजार हूं कि उसने इस दर्दनाक और दरिंदगी से भरी घटना को लेकर देश और दुनिया को आगाह किया है। इससे सरकार और हरेक आदमी को सबक लेना चाहिए। ऐसी कानून व्यवस्था होनी चाहिए कि ऐसी घटना दोबारा न हो।"
वो कहते हैं कि अगर एकता की मिसाल देखनी हो तो सेना को देखना चाहिए। जहां एक ही मज़हब है। जहां सब भाई-भाई हैं।