दिल्ली हाईकोर्ट ने लॉकडाउन के दौरान घरों का किराया माफ करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया। पीठ ने निर्देश दिया कि अगर रेंट एग्रीमेंट में आपदा के कारण किराये में छूट का क्लॉज है तो किराये में छूट दी जा सकती है। अगर ऐसा नहीं है तो किरायेदारों को किराया देना होगा।
न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह की एकल पीठ ने किरायेदारों की ओर से किराया माफ करने की मांग वाली याचिका पर वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई की। पीठ ने कहा कि मकान मालिक और किरायेदार के बीच का रिश्ता कई तरीकों का हो सकता है। ये रिश्ते या तो कांट्रेक्ट से बंधे होते हैं या कानून से।
कांट्रेक्ट वाले मामलों में पक्षकारों के हक-अधिकार उसी कांट्रेक्ट की शर्तों और नियमों के आधार पर तय होंगे। अगर किराए को लेकर बनाए गए रेंट एग्रीमेंट में ऐसे क्लॉज या शर्त को शामिल किया गया है कि अप्रत्याशित आपदा की स्थिति में किराए से छूट या किराया माफ किया जाएगा तभी किरायेदार को इन शर्तों का लाभ मिल सकता है, अन्यथा किराए के घर में बने रहने के लिए किराएदार को किराए का भुगतान करना होगा।
पीठ ने कहा कि अगर इस संबंध में मकान मालिक और किरायेदार के बीच कोई करार नहीं है तो इस स्थिति में कानून लागू होगा, जिसके तहत किरायेदार को किराया हर हाल में देना होगा और इसी तरह से ऐसे मामलों का निपटारा होगा। पीठ ने कहा कि अप्रत्याशित आपदा का क्लॉज इंडियन कांट्रेक्ट एक्ट, 1872 के तहत मान्य है।
कोर्ट ने सीधे-सीधे कहा कि मूलभूत सिद्धांत यही है कि यदि कांट्रेक्ट में किराये से छूट की बात देने वाला कोई क्लॉज है, तभी एक किरायेदार को उसके लिए दावा करने का हक है। इसके साथ ही पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया। ये याचिकाएं किरायेदारों की ओर से दायर की गईं।
कहा गया कि लॉकडाउन में कामकाज बंद होने से वे लोग किराया देने की स्थिति में नहीं है और किराया ना दे पाने के कारण मकान मालिकों द्वारा उन्हें घर खाली करने के लिए कहा गया है। मकान मालिकों द्वारा घर खाली करने के फैसले को किराएदारों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।