दिल्ली ट्रांसपोर्ट यूनियन के अध्यक्ष राजेंद्र कपूर ने बताया कि लॉकडाउन के कारण भारी संख्या में मजदूर अपने घरों को लौट गए हैं। इसके कारण पल्लेदारों की कमी हो गई है। कई जगहों पर सामान चढ़ाने और उतारने के लिए मजदूर नहीं मिल रहे हैं।
अनेक फैक्ट्रियों और कंपनियों में भी इसी तरह के हालात बन रहे हैं। इसके अलावा ट्रांसपोर्ट उद्योग को ट्रकों के लिए ड्राइवरों और सहयोगी कर्मचारियों की कमी का भी सामना करना पड़ रहा है। अगर औद्योगिक क्षेत्रों में कामकाज शुरु होता है तो मजदूरों की कमी और अधिक बढ़ेगी।
दिल्ली और एनसीआर एरिया में निर्माण क्षेत्र में सबसे ज्यादा मजदूरों की मांग होती है। लेकिन इस क्षेत्र की कमर पहले से टूटी हुई है। लॉकडाउन ने इसको और अधिक कमजोर करने वाला काम किया है।
दिल्ली कर्मचारी संघ के सचिव लक्ष्मीराज सिंह ने कहा कि मई के लिए लोगों को राशन बांटा जा रहा है। सुबह से अब तक लाइन लगी है लेकिन लोगों को राशन नहीं मिल रहा है।
मजदूरों के सामने भुखमरी की स्थिति पैदा हो गई है। ऐसे में कोई भी मजदूर यहां नहीं टिकना चाहता है। वे स्वयं भी दिल्ली सरकार और नोडल अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं जिससे उन्हें उनके घरों को भेजा जा सके।
हालांकि, मजदूर संघ की इस मायने में राय अलग है। संघ के दिल्ली प्रांत के महामंत्री अनीश मिश्रा ने अमर उजाला को बताया कि दिल्ली और एनसीआर एरिया में उद्योगों को चलाने में मजदूरों की कमी आड़े नहीं आएगी।
इसकी वजह है कि यूपी-बिहार के लाखों मजदूरों ने यहां पर अपने स्थाई घर बना लिए हैं। उनके लिए दिल्ली ही उनका घर बन चुका है। ऐसी स्थिति में मजदूरों का यह वर्ग बाहर नहीं जाएगा और उद्योगों को चलाने में पूरी मदद करेगा।
उन्होंने कहा कि सारे उद्योग भी एक साथ शुरू नहीं होने जा रहे हैं। शुरुआत में यहां के मजदूरों से काम चल जाएगा। लेकिन जैसे-जैसे परिस्थितियां सामान्य होंगी, घरों को वापस गए मजदूर भी लौटेंगे और पूरी व्यवस्था पटरी पर लौट आएगी।
इसलिए उद्योगों को चलाने में मजदूरों की कोई कमी नहीं आएगी, यह उनका विश्वास है। इसी बीच उन लोगों की तरफ से मजदूरों को सूखा राशन और तैयार भोजन भी बांटा जा रहा है।
एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली और एनसीआर एरिया में लगभग 40 से 45 लाख मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। इनमें लगभग 10 लाख गुरुग्राम और दस से 12 लाख के बीच गाजियाबाद और नोएडा में काम करते हैं।
इसके अलावा आसपास के फरीदाबाद जैसे जिलों में भी भारी संख्या में मजदूर रहते हैं। अनुमान है कि इनमें से आठ से दस लाख के बीच मजदूर पलायन कर सकते हैं।