साइबर सिटी के लिए जाम इतना बड़ा मुद्दा हो गया है कि राज्य सरकार हिली पड़ी है। केंद्र सरकार को बयान देना पड़ रहा है। लेकिन दूरगामी सोच के साथ जाम से मुक्ति की कोई ऐसी योजना नहीं बन रही है जिससे यहां के लोगों को राहत मिले।
शहर में 22 सितंबर 2015 से कार फ्री अभियान चलाया जा रहा है, ताकि लोगों को कम से कम एक दिन जाम से राहत मिले। लेकिन अब तक ऐसा कुछ नहीं हो पाया। शहर के अंदरूनी रूटों पर भी इससे राहत नहीं मिल पाई है। सवाल यह उठता है कि क्या यह अभियान फेल हो गया है।
कार फ्री डे के नाम पर खूब तमाशा हो रहा है। यह सिर्फ रस्म अदायगी भर बनकर रह गया है। साइबर सिटी के लोग सप्ताह में एक दिन के लिए कार तो छोडने के लिए तैयार हैं, लेकिन सरकार ने साइकिल वालों के लिए सड़कों पर ट्रैक नहीं बनवाया। इसलिए यह योजना सफल नहीं हो पा रही है। जिससे अब तक जाम की समस्या नहीं हल हो पाई। सरकारी लापरवाही का ही नतीजा है कि जाम ने दो दिन में ही गुडग़ांव का हुलिया बदल दिया। अगर साइकिल ट्रैक की मौजूदगी होती तो वाहनों का दबाव काफी कम हो जाता।
चमकते-दमकते गुडग़ांव में सरपट दौड़ती गाडिय़ों के बीच साइकिल चलाना जान जोखिम में डलने से कम नहीं है। जानकार कहते हैं कि साइकिल की सवारी तभी सफल हो सकती है जब हर सड़क पर इसके लिए ट्रैक बने। फिडैलिटी इंडिया कंपनी कर्मियों ने साइकिल से दफ्तर आने का अभियान शुरू किया था। अधिकांश कर्मचारी साइकिल से आने लगे। लेकिन एक कर्मचारी का एक्सीडेंट हो गया। उसकी मौत हो गई। इसलिए अभियान बंद करना पड़ा।
साइबर सिटी, गोल्फ कोर्स रोड, सुशांत लोक और उद्योग विहार आदि में साइकिल ट्रैक होना चाहिए। इन इलाकों में आईटी, बीपीओ और कंपनियों के कॉरपोरेट कार्यालयों की वजह से कारों की भीड़ है। इनमें चलने वाली कैब के कारण सड़क पर वाहनों की भारी भीड़ रहती है। लगभग 22 हजार कैब इन कंपनियों में लगी हैं। कैब वाले हर रोज औसतन चार चक्कर लगाते हैं। अगर सार्वजनिक परिवहन प्रणाली अच्छी हो और साइकिल के लिए ट्रैक हो तो यहां की सूरत बदल सकती हैं लेकिन दुर्भाग्य से यह दोनों नहीं हैं।