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धुंध और धुएं से लिपटे शहर में कैसे आएंगे परिंदे

Sun, 23 Nov 2014 10:00 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, फरीदाबाद
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राष्ट्रीय राजधानी से नाराज है प्रवासी पक्षी
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राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में अंधाधुंध हो रहे सरकारी और निजी निर्माणों ने बेजुबानों का चैन छीन लिया है। बेरहम विकास की दौड़ में हमने न सिर्फ पक्षियों का आशियाना छीना बल्कि बल्कि पारिस्थैतिकी तंत्र (इकोलॉजी सिस्टम) को तहस-नहस कर दिया। नतीजा यह है कि पूरा शहर इस समय धुएं और धुंध में लिपटा हुआ है। इससे पक्षी दूर भाग रहे हैं।

शहर के सबसे पुराने बर्ड वाचर डॉ. योगेश पाराशर की नजर ने पिछले तीन दशक में जो बदलाव देखे हैं, उनमें मनुष्य ने सबसे ज्यादा नुकसान इन बेजुबानों को ही पहुंचाया है। डॉ. पाराशर के मुताबिक, 30 साल पहले बल्लभगढ़ के आसपास काफी पक्षी देखने को मिलते थे।
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बड़खल, सूरजकुंड क्षेत्र तो इसके लिए काफी धनी माने जाते थे। लेकिन अब इन दोनों के सूखने के बाद यहां भी पक्षियों की आवाज नहीं सुनाई देती। सूरजकुंड की पीकॉक झील भी निर्दयी काल का शिकार हो गई। पाराशर के मुताबिक हाइवे के साथ बने सेक्टर भी बागान काट कर बनाए गए हैं।

देश की कई बर्ड सेंचुरी को खंगालने के बाद ‘ए ब्रीथ ऑफ फ्रेस एयर’ नामक पुस्तक लिखने वाले वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर एवं पक्षी विशेषज्ञ एन. शिवकुमार ने इस औद्योगिक शहर में रहने के लिए पक्षियों द्वारा किए जा रहे समझौते का दर्द बयां करतीं कई तस्वीरें समय-समय पर कैद की हैं।

शिवकुमार कहते हैं कि हमने बिल्डिंग पर बिल्डिंग खड़ी करते-करते पूरे शहर को कंक्रीट के जंगल में बदल दिया। अपने आशियाने और सुविधा के लिए इन पक्षियों के घरौंदे उजाड़ दिए।

20 हजार से अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं

एक अनुमान के मुताबिक फरीदाबाद में सिक्स लेन (हरियाणा क्षेत्र), मेट्रो और सूरजकुंड रोड प्रोजेक्ट में पिछले कुछ वर्षों में कुल मिलाकर 20 हजार से अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं, लेकिन उनकी जगह लगाने का मसला अभी तक हल नहीं हुआ।
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परेशान हैं परिंदे
देश में सबसे पहले हरियाणा ने अपने पर्यटन स्थलों के नाम पक्षियों के नाम पर रखे थे, ताकि लोग उनसे प्यार करें। उनकी रक्षा का यत्न करें। लेकिन अब इसी प्रदेश में परिंदे परेशान हैं। अब न गोरैया चहचहाती है न तो गिद्द दिखते हैं। इसके परिणाम हमें ही भुगतने होंगे।
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