दिल्ली के आसपास के इलाकों में रहने वाले लोग शहर के व्यस्त जीवन से समय निकाल कर शाम के वक्त या छुट्टियों के दिन अक्सर राजधानी की खूबसूरती का दीदार करने के लिए कनॉट प्लेस (सीपी) जाते हैं। मोटे-मोटे खंभों पर खड़ी, एक जैसी दिखने वाली सफेद मनमोहक इमारतें मन को भा जाती हैं। तरह-तरह की सुविधाओं से लैस कनॉट प्लेस पर हमेशा ही टहलने वालों की भीड़ लगी रहती है, लेकिन आप यह जान कर हैरान हो जाएंगे कि आज इमारतों और बिल्डिंगों वाला कनॉट प्लेस कभी घना जंगल हुआ करता था। आगे पढ़िए सीपी के बारे में कुछ रोचक बातें:
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कनॉट प्लेस
- फोटो : Social Media
बात आज से करीब 80-90 साल पहले की है। दिल्ली के कनॉट प्लेस में सेंट्रल पार्क, पालिका बाजार, रीगल और प्लाजा सिनेमा हॉल की जगह चारों तरफ केवल घने जंगल हुआ करते थे। जंगल के साथ ही आसपास कुछ गांव और पास में एक मंदिर थी। यही मंदिर आज प्राचीन हनुमान मंदिर के नाम से प्रचलित है।
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कनॉट प्लेस
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इन जंगलों में दिन के वक्त माधोगंज, जयसिंहपुरा और राजा का बाजार के लोगों की भीड़ होती थी, लेकिन शाम होते ही जंगली जानवरों के डर से सन्नाटा छा जाता था। इन जंगलों में गीदड़, जंगली सूअर, तीतर चिड़िया आदि पाए जाते थे।
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कनॉट प्लेस
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अंग्रेजों ने जब दिल्ली में एक बड़ा बाजार बनाने की योजना बनाई तो उन्हें यह जगह पसंद आई। बाजार के लिए बड़े क्षेत्र की जरूरत थी, इसलिए उन्होंने पूरे जंगल को साफ कर दिया। आस-पास के गांवों में रहने वाले लोगों को करोल बाग भेज दिया गया।
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कनॉट प्लेस
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इसके बाद बाजार का नक्शा बनाने का काम अंग्रेज वास्तुकार रोबर्ट टोर रसेल को सौंपा गया। पूरे मार्केट को 12 ब्लॉकों में बांटा गया। अंग्रेजी अक्षरों के हिसाब से A से लेकर L तक इक ब्लॉकों के नाम रखे गए।
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शाम के वक्त कनॉट प्लेस का माहौल
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बाजार की खूबसूरती बढ़ाने के लिए पूरे नक्शे को तीन गोलों में बांटा गया, जिसे इनर और आउटर सर्कल के नाम से जाना जाता है। अंदर वाले सर्कल के भीतर पार्क है और बाहर के सर्किल पर गाड़ियों के आने-जाने के लिए रास्ता बनाया गया। बाहर वाले सर्कल से निकलने वाले 10 मुख्य रास्ते ही कनॉट प्लेस को पूरी दिल्ली के अगल-अलग इलाकों से जोड़ते हैं।
कनॉट प्लेस के निर्माण का काम साल 1929 में शुरू हुआ था। इस मार्केट को बनाने में चार साल लगे और 1933 में इसका निर्माण कार्य पूरा हो गया। इसका नाम अंग्रेज परिवार डयूक ऑफ कनॉट के नाम पर रखा गया।