हिंदी: अपनों की भाषा, सपनों की भाषा
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सरकार ने हिंदी को राजभाषा का दर्जा तो दिया है, लेकिन अधिकतर सरकारी काम-काज अंग्रेजी में होते हैं। वर्षों से हिंदी में काम कराने के लिए निगरानी समितियां गठित होती आ रही हैं। आए दिन विभागों में नोटिस निकलता है।
लेकिन अधिकतर शासकीय लोग अंग्रेजी में बात करना ओहदा समझते हैं। यह कहने में जरा सा गुरेज नहीं है कि ऐसा करने में महिलाओं का योगदान सर्वाधिक है। वर्षों बाद नई शिक्षा नीति में बदलाव आया है, जिसे देखकर लगता है कि अब देश की नवचेतना को हिंदी में काम करने के लिए जागृत होना पड़ेगा।
हो सके तो अंग्रेजी का बहिष्कार भी करना होगा। अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से चलाए जा रहे #हिंदीहैंहम अभियान के तहत शनिवार को हुई बातचीत के दौरान अपने बेबाक अंदाज व जबरदस्त अभिनय के लिए पहचाने जाने वाले राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के निदेशक सुरेश शर्मा ने यह बातें कहीं।
सुरेश शर्मा ने कहा कि एनएसडी का निदेशक होने के नाते वह कई बार नाट्य जगत के कई नामचीन लोगों को अंग्रेजी में बातचीत करने के दौरान टोक देते हैं। अपना अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि जापान, चीन, फ्रांस, जर्मनी के नाट्य कलाकार भारत आकर अपनी भाषा में बातचीत करते हैं।
उनकी बातचीत को इंटरप्रेटर हिंदी में अनुवादित करता है। चीन में केवल 10 प्रतिशत लोग अंग्रेजी में बात करते हैं। लेकिन यहां पर कला, साहित्य और नाट्य जगत के कई जानेमाने लोग बड़े गौरवपूर्ण भाव से अंग्रेजी में बातचीत करते हैं।
सबसे बड़ी चुनौती देश की आईआईटी और मेडिकल संस्थानों में होने वाले शत प्रतिशत अंग्रेजी के लेक्चरों को हिंदी में बदलना है। यहां वर्षों से बच्चों का समय इन लेक्चरों को समझने के बजाय इसका हिंदी में अनुवाद करने में बर्बाद होता है। देश के बच्चे हिंदी में ही सुनें और हिंदी में ही सोचें तो यकीन है कि भारत का आने वाला कल सुनहरा होगा।