देश के लिए प्राण बलिदान करने की शपथ लेने वाले सशस्त्र बलों के लोग विशेष व्यवहार के अधिकारी हैं और उन्हें प्रताड़ित नहीं किया जाना चाहिए। उन्हें एक अधिकरण से दूसरे तक चक्कर नहीं लगवाए जाने चाहिए। यह तल्ख टिप्पणी केंद्रीय रक्षा मंत्रालय के एक आदेश के खिलाफ दायर 40 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए की।
इस आदेश के मुताबिक प्रो राटा पेंशन का लाभ केवल कमीशन प्राप्त सैन्य अधिकारियों तक सीमित कर दिया गया है। याचिका दायर करने वाले वायु सेना के नॉन कमीशन अधिकारियों तथा अन्य सैन्य कर्मियों ने इस आदेश को भेदभावपूर्ण बताते हुए अदालत में चुनौती दी है। याचिकाकर्ताओं ने भी प्रो राटा के अनुसार पेंशन देने की मांग की है।
न्यायमूर्ति राजीव सहाय एंडलॉ व न्यायमूर्ति आशा मेनन की खंडपीठ ने इस बात पर गौर किया कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल, सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के जजों को प्राणों के बलिदान की शपथ लेना जरूरी नहीं है। केवल सशस्त्र बलों में काम करने वालों को संविधान व कानून के तहत उन्हें राष्ट्रपति या अपने अधिकारी की आज्ञा अपने प्राणों की कीमत पर भी पालन की शपथ लेना जरूरी है
खंडपीठ ने याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए 12 सप्ताह के भीतर बकाया पेंशन प्रो राटा पेंशन के अनुसार भुगतान करने का आदेश भारतीय वायु सेना को दिया है। हाईकोर्ट ने कहा भविष्य में प्रो राटा पेंशन मार्च 2021 से दी जाएगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर बकाया भुगतान 12 सप्ताह में नहीं किया गया तो उस राशि पर सात फीसदी ब्याज भी लगेगा।
खंडपीठ ने इस बात पर भी गौर किया कि एयर फोर्स ट्रिब्यूनल (एएफटी) ने क्षेत्राधिकार का हवाला देते हुए याचिकाकर्ताओं को राहत देने से इनकार कर दिया था। एक अन्य कई पीठों ने ऐसी याचिकाओं पर सुनवाई के बाद याचिकाकर्ताओं को राहत दी थी।