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Delhi HC: हाईकोर्ट की टिप्पणी- माता-पिता के बीच कस्टडी की लड़ाई में बच्चों को ज्यादा नुकसान

Tue, 23 Jan 2024 12:24 AM IST
विजय पुंडीर अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

उच्च न्यायालय ने पारिवारिक अदालत के आदेश के खिलाफ मां द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया जिसने नाबालिग लड़के की संयुक्त कस्टडी माता-पिता दोनों को दी थी। पारिवारिक अदालत ने पिता को मुलाकात का अधिकार भी दिया था।
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दिल्ली हाईकोर्ट
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विस्तार
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उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि माता-पिता के बीच कस्टडी की लड़ाई में बच्चों को सबसे ज्यादा नुकसान होता है। अदालत ने उक्त टिप्पणी पारिवारिक अदालत के उस आदेश को बरकरार रखते हुए की जिसमें माता-पिता दोनों को नाबालिग लड़के की संयुक्त कस्टडी के साथ-साथ पिता को मुलाकात का अधिकार भी दिया है।

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न्यायमूर्ति सुरेश कुमार कैत और न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि पारिवारिक अदालत ने यह मानने के लिए संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है कि माता-पिता दोनों प्राकृतिक अभिभावक हैं और दोनों के मन और आचरण में बच्चे का हित और कल्याण होता है।

उच्च न्यायालय ने पारिवारिक अदालत के आदेश के खिलाफ मां द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया जिसने नाबालिग लड़के की संयुक्त कस्टडी माता-पिता दोनों को दी थी। पारिवारिक अदालत ने पिता को मुलाकात का अधिकार भी दिया था, जबकि नाबालिग की कस्टडी 18 साल की होने तक मां को दी गई थी। पारिवारिक ध्रुवीकरण के कारण बच्चा सब रिश्ते को खो देता है
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पीठ ने कहा, अभिरक्षा की लड़ाई में सबसे अधिक नुकसान बच्चे को होता है क्योंकि भले ही माता-पिता में से कोई भी जीत जाए, पारिवारिक ध्रुवीकरण के कारण बच्चा सब रिश्ते खो देता है। केवल बच्चा पैदा करने से कोई माता-पिता नहीं बन जाता, बल्कि जो माता-पिता के ऐसे झगड़ों में बच्चे को टूटने से बचाता है, वही आदर्श माता-पिता बनने के सबसे करीब होता है। ध्यान बच्चे के भविष्य पर होना चाहिए न कि माता-पिता के अतीत पर।

इस जोड़े की शादी 11 मई 2006 को हुई और उनके बेटे का जन्म 2 मई 2007 को हुआ। जोड़े के बीच वैवाहिक विवाद पैदा हो गए और वे 2009 में अलग हो गए। हालांकि, बच्चे की कस्टडी मां के पास ही रही। पिता ने संरक्षकता याचिका दायर कर दावा किया कि मां बच्चे के हितों की रक्षा करने के लिए उपयुक्त नहीं है।

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पत्नी की क्रूरता के कारण गुजारा भत्ते से इन्कार का आधार नहीं : हाईकोर्ट
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि तलाक की कार्यवाही में पत्नी के खिलाफ क्रूरता के निष्कर्ष घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत उसके भरण-पोषण से इन्कार करने का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने पति को अपनी पत्नी को 50 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने का निर्देश देते हुए यह टिप्पणी की।

उच्च न्यायालय ने यह फैसला एक सत्र अदालत के आदेश के खिलाफ एक महिला की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है। सत्र अदालत ने मजिस्ट्रेट के उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें पति को भरण-पोषण और मुआवजे के लिए प्रति माह एक लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था।

मामला 1991 में हुई एक शादी से जुड़ा है, जहां उसी साल एक बच्चे का जन्म हुआ। हालांकि, अगले डेढ़ दशक में दोनों में खटास आ गई, जिसके कारण उन्हें 2009 में घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत शिकायत दर्ज करनी पड़ी।

सत्र अदालत ने पत्नी को भुगतान के लिए कोई अंतरिम गुजारा भत्ता तय किए बिना मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए ट्रायल कोर्ट में वापस भेज दिया, जिसके परिणामस्वरूप पत्नी ने आगे और विशिष्ट राहत के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
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