आजादी के 71 साल बाद भी देश में दलितों पर अत्याचार समाप्त नहीं हुए हैं। हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी हरियाणा के मिर्चपुर कांड में 15 दोषियों की अपील खारिज करते हुए की है।
हरियाणा में हिसार जिले के मिर्चपुर गांव में दबंगों ने ताराचंद के घर में 21 अप्रैल 2010 को आग लगा दी थी। इसमें वह और उसकी दिव्यांग बेटी जिंदा जल गए थे। इस कांड के बाद गांव के दलित परिवारों ने पलायन कर दिया था। जस्टिस एस. मुरलीधर व जस्टिस आईएस मेहता की खंडपीठ ने फैसले में कहा कि दोषियों को राहत देने का कोई आधार नहीं है। निचली अदालत का फैसला पूरी तरह सही था। इसलिए इसमें दखल देने की कोई जरूरत नहीं है।
रोहिणी जिला अदालत ने 31 अक्तूबर 2011 को कुलविंदर, धरमबीर व रामपाल को गैरइरादतन हत्या का दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। अदालत ने पांच अन्य आरोपियों बलजीत, करमवीर, करमपाल, धरमबीर व बोबल को दंगा-फसाद, चोट पहुंचाने, शरारत, आगजनी व एससी-एसटी अत्याचार रोकथाम अधिनियम की धाराओं में दोषी ठहराते हुए पांच साल कैद की सजा सुनाई थी।
अन्य सात दोषियों को जेल में काटी गई अवधि के मद्देनजर एक साल की नेकचलनी व जुर्माने की शर्त पर छोड़ दिया था। निचली अदालत के इस फैसले के खिलाफ दोषियों ने और 82 आरोपियों को बरी किए जाने तथा कम सजा के खिलाफ जांच एजेंसी ने अपील की थी।