सूत्र बताते हैं कि इस दौरान पार्टी के भीतर लॉबिंग शुरू हो गयी। पार्टी फोरम पर हर नेता को टिकट देने के लिये कुछ लोग खड़े हो जाते। एकबारगी लगा कि हर नेता दूसरे को काट रहा है। आप में इस मसले पर जबरस्त घमासान मच गया था।
पार्टी की सेहत के लिये यह बेहद खतरनाक था। किसी को उम्मीद नहीं थी कि पार्टी नेता इस तरह बिखरे दिखेंगे। पार्टी के मुताबिक, इसी दौरान एनडी गुप्ता का नाम सामने आया। वहीं, करीब डेढ़ महीने पहले पश्चिमी दिल्ली के करीब 15 विधायकों ने सुशील गुप्ता के नाम की सिफारिश लेकर पहुंचे।
सुशील गुप्ता को आप ने मोती नगर से 2013 में चुनाव लड़ाने की कोशिश की थी। जबकि 2015 के विधान सभा चुनाव में उन्होंने आप विधायक के समर्थन में खुद ही चुनाव नहीं लड़ा था। विधायकों की सिफारिश मिलने पर सुशील गुप्ता के बारे में तहकीकात की गयी।
एक पदाधिकारी ने बताया कि दिल्ली के अलावा सुशील गुप्ता का हरियाणा में मजबू नेटवर्क है। 14 जिलों में उनकी संस्थाएं काम कर रही है। वहीं, कोई आपराधिक रिकार्ड भी नहीं है। ऐसे में पार्टी ने हरियाणा के लिये पार्टी ने इस नाम को बेहतर माना।
नेटवर्क के अलावा हरियाणा के 15 फीसदी वैश्य मतदाताओं को आप से जोडने पर यह मददगार हो सकते हैं। लिहाजा गुप्ता के नाम पर मुहर लगा दी गयी।