केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन के सेक्स एजुकेशन को लेकर दिए गए बयान पर अब हंगामा बढ़ने लगा है। उनके इस बयान पर जहां सामाजिक कार्यकर्ता खासे नाराज हैं, वहीं विपक्षियों ने भी उन्हें आड़े हाथों लिया है। लोगों का गुस्सा देखकर अब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने अपने बयान पर सफाई दी है।
डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि सेक्स एजुकेशन समाज को लिंग भेदभाव, कम उम्र में प्रेगनेंसी, एचआईवी एड्स और पोर्नोग्राफी का आदी बना दी देती है।
केंद्रीय मंत्री ने अपने बयान पर सफाई देते हुए कहा कि यूपीए सरकार की ओर से लागू किया गया सेक्स एजुकेशन प्रोग्राम महज अश्लीलता और आपत्तिनजक तस्वीरों का ग्राफिक के जरिए प्रदर्शन करता है। ये सेक्स एजुकेशन नहीं है।
हर्षवर्धन के बयान का हर तरफ विरोध
डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि वह खुद एक डॉक्टर हैं और तर्कवाद का समर्थन करते हैं। साथ ही यह भी कहा कि वह शिक्षा-विज्ञान का पूरी तरह समर्थन करते हैं।
वहीं, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री की टिप्पणी पर विरोधी दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी मोर्चा खोल रखा है। आम आदमी पार्टी की नेता अलका लांबा ने कहा कि हर्षवर्धन का बयान पढ़ने के बाद उन्हें यह नहीं समझ आया कि वह हसें या रोएं।
कांग्रेस नेता शशि थरूर ने कहा कि वह हर्षवर्धन का बहुत सम्मान करते हैं लेकिन शायद वह अब भी पुराने समय में जी रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता आभा सिंह ने कहा कि यह बहुत की गैरजिम्मेदाराना बयान है। इसे तुरंत वापस लिया जाना चाहिए।
वेबसाइट पर लिखी टिप्पणी
एचआईवी एड्स और कंडोम के इस्तेमाल को लेकर दिए गए विवादास्पद बयान के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने एक बार फिर ऐसा ही बयान दिया है।
डॉ. हर्षवर्धन ने कहा है कि स्कूलों में सेक्स एजुकेशन को बढ़ावा देने के बजाय इस पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। स्वास्थ्य मंत्री ने यह बात अपनी निजी वेबसाइट www.drharshvardhan.com पर लिखी है।
इस बयान के बाद अब कई सामाजिक कार्यकर्ताओं की नजर डॉ. हर्षवर्धन पर टेढ़ी होने लगी है। उनका आरोप है कि स्वास्थ्य मंत्री देशभर में आरएसएस का एजेंडा लागू करना चाहते हैं।
हर्षवर्धन के बयान से पार्टी ने किया किनारा
डॉ. हर्षवर्धन ने लिखा है कि स्कूलों में तथाकथित सेक्स एजुकेशन को बैन किया जाना चाहिए और इसकी जगह योगा को अनिवार्य विषय के तौर पर लागू किया जाए।
अपनी वेबसाइट पर उन्होंने यह भी लिखा कि स्कूलों में पाठ्यक्रम के जरिए मर्यादा और देश की संस्कृति को अपनाने से संबंधित मूल्यों पर जोर देना चाहिए।
इस मामले में भाजपा प्रवक्ता संजय कौल ने कहा कि सेक्स एजुकेशन को बैन करने से संबंधित कोई भी चर्चा अब तक पार्टी के भीतर नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि इस बयान से पार्टी का कोई लेना देना नहीं है।
पहले भी दिया था विवादित बयान
बता दें कि इसके पहले भी डॉ. हर्षवर्धन ने विदेशी अखबार को दिए गए इंटरव्यू में कहा था कि एचआईवी और एड्स को रोकने के लिए चलाए जा रहे कैंपेन में कंडोम के इस्तेमाल का प्रचार करना गलत है।
उन्होंने कहा था कि कंडोम के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के बजाय हमें भारतीय संस्कृति और पति-पत्नी के बीच रिश्ते की पवित्रता का प्रचार करना चाहिए।
इसके बाद अपनी सफाई में हर्षवर्धन ने समस्या का निराकरण इलाज से बेहतर होता है।
पहले भी हुआ है सेक्स एजुकेशन का विरोध
अगर वर्तमान स्थिति देखी जाए तो बहुत कम समय में ही बच्चे यौन मामलों में सक्रिय हो रहे हैं। बदलते परिवेश के साथ घर-परिवार में भी बच्चों को सेक्स के बारे में माता-पिता से सीख मिलती है और इस मामले में स्कूल भी बड़ा रोल निभाते हैं। ऐसे में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री का ये बयान थोड़ा अचरज भरा लगता है।
हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है जब किसी राजनीतिक दल या नेता ने सेक्स एजुकेशन का विरोध किया हो। 2007 में नाको और एचआरडी मिनिस्ट्री की ओर से लागू किए गए किशोर शिक्षा प्रोग्राम को लेकर भी बड़ा विवाद उठा था।
इसका विरोध करने वाले लोगों का कहना था कि स्कूलों में बच्चों को सेक्स एजुकेश्ान देना उन्हें समय से पहले बड़ा देना हैं और यह देश की संस्कृति के खिलाफ है। इससे उनके सेक्सुअल बिहेवियर में बदलाव आएगा।