अदालत ने कहा भारत सहित कई समाजों में मौजूद सामाजिक दबाव के कारण क्योंकि पीड़िता गर्भवती हो गई थी पीड़िता की मां ने आरोपी के दबाव में आकर अपनी बेटी की शादी उससे करा दी, क्योंकि वह बच्चे का जैविक पिता था।
दिल्ली हाईकोर्ट ने यौन उत्पीड़न मामले में आपराधिक कार्यवाही से बचने के लिए पीड़िता से शादी करने के चलन पर गहरी चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि ये देखा गया है कि मामला रद्द होने या जमानत मिलने के बाद आरोपी तुरंत पीड़िता को छोड़ देता है। अदालत ने उक्त टिप्पणी करते हुए दुष्कर्म के आरोपी के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द करने से इन्कार कर दिया।
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न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने भारतीय दंड संहिता के साथ-साथ यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम (पोक्सो) की धारा 6 के तहत दुष्कर्म और अन्य अपराधों के लिए 2021 में दिल्ली पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर को रद्द करने की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि चौंकाने वाली बात यह है कि ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां आरोपी धोखे से इच्छा की आड़ में शादी कर लेता है, खासकर जब पीड़िता गर्भवती हो जाती है और बाद में डीएनए परीक्षण से आरोपी के जैविक पिता होने की पुष्टि होती है। विवाह संपन्न होने और बाद में आपराधिक मुकदमा चलाने से छूट मिलने के बाद आरोपी कुछ ही महीनों के भीतर पीड़िता को बेरहमी से छोड़ देता है। न्यायालय ने कहा कि इस मामले में सामाजिक दबाव के कारण उत्तरजीवी और आरोपी की शादी हो सकती है।
अदालत ने कहा भारत सहित कई समाजों में मौजूद सामाजिक दबाव के कारण क्योंकि पीड़िता गर्भवती हो गई थी पीड़िता की मां ने आरोपी के दबाव में आकर अपनी बेटी की शादी उससे करा दी, क्योंकि वह बच्चे का जैविक पिता था। वर्तमान मामले में यह आरोप शामिल है कि 20 वर्षीय आरोपी ने 17 वर्षीय लड़की के साथ दुष्कर्म किया था, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसने बाद में उसके गर्भवती होने के बाद शादी कर ली थी।
बताया जाता है कि दोनों की मुलाकात ट्यूशन क्लास में हुई थी। लड़की ने दावा किया कि आरोपी ने उसे शराब दी और एक गेस्ट हाउस में उसके साथ बिना सहमति के यौन संबंध बनाए।