मेवात जिले के तीन विधानसभा सीटों के लिए सियासी बिसात बिछ गई है। इनपर प्रमुख पार्टियों के प्रत्याशी अपने प्रतिद्वंद्वियों को मात देने के लिए संघर्षरत हैं। एक सीट पर जहां मेवात के दो बड़े चौधरियों के लाल आमने-सामने हैं, वहीं कई पूर्व मंत्रियों और उनके पुत्र की भी इस बार प्रतिष्ठा दांव पर लगी है।
विज्ञापन
इस जिले में पिछले दस वर्षों में विकास अनेक काम किए हैं। इसके बावजूद जिले में समस्याएं इतनी हैं कि इतने कार्यों के कराने के बाद भी यह ऊंट के मुंह में जीरा के समान लगते हैं।
कोटला झील, मेवात में रेल परियोजना लाने की मांग दशकों पुरानी है, जिसपर कोई ठोस पहल नहीं हुई। पलवल के रास्ते मेवात में रेनीवेल परियोजना लाने के बाद भी जिले के तकरीबन सवा पांच सौ गांवों में आज भी जल संकट है।
विज्ञापन
सोहना-नूंह के अलावा जिले के किसी अन्य सड़क फोर लेन नहीं किया। विश्वविद्यालय और महिला कॉलेज की मांग भी सिरे नहीं चढ़ पाई।
जवाब नहीं दे पा रहे विधायक
तीनों सीटों के मौजूदा विधायकों व प्रमुख प्रत्याशियों से जनता सवाल पूछ रही है कि पिछले पांच वर्षों में क्षेत्र के विकास और समस्याओं को दूर करने में उनकी क्या भूमिका रही।
स्थिति यह है कि एक मौजूदा विधायक घर के आगे की सड़क पिछले पांच वर्षों तक खस्ता रही। चुनाव की घोषणा से पहले उसे ठीक कराया गया। इस तरह एक अन्य विधायक के पुश्तैनी गांव में हाई स्कूल तक नहीं है।
जनता द्वारा उठाए जा रहे इन सवालों के अलावा चुनाव में जीत-हार बहुत हद तक चुनावी समीकरण, गोत्र व पाल और पिछले पांच वर्षों में विधायकों के रवैये पर निर्भर करेगा। तीन में से दो दो विधायकों पर लोग पार्टीबाजी को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हैं।
त्रिकोणीय मुकाबला बनाने में लगे हैं संजय
नूंह: मेवात की यह महत्वपूर्ण सीट फिलहाल कांग्रेस के कब्जे में है। यहां से प्रदेश के परिवहन मंत्री तथा मेवात के दिग्गज नेता खुर्शीद अहमद के पुत्र आफताब अहमद दूसरी बार कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। उन्हें कड़ी टक्कर दे रहे हैं मेवात के दूसरे दिग्गज नेता तैयब हुसैन के बड़े पुत्र तथा इंडियन नेशनल लोकदल प्रत्याशी जाकिर हुसैन।
जाकिर पिछले कई चुनाव निरंतर हारते आ रहे है तथा नूंह से पहली बार चुनाव मैदान में है। इलाके के एक वर्ग की सहानुभूति इस बार इनके साथ दिखाई दे रही है। इनके अलावा भाजपा के कुंवर संजय सिंह मुकाबले को निरंतर तिकोना बनाने में लगे हैं। वह सोहना सीट से चुनाव लड़ने के इच्छुक थे, पार्टी ने उन्हें नूंह से उतार दिया।
संजय के पिता भी विधायक रहे चुके हैं। इस सीट से जाहिद अहमद बाई भाजपा के टिकट के दावेदार। टिकट नहीं मिलने पर फिलहाल खामोश बैठे हैं। इनके अलावा इनेलो में भी कई विद्रोहियों की सक्रियता से मुकाबला दिलचस्प हो गया है। आफताब और जाकिर एक ही पाल के हैं। इस सीट से कुल 07 उम्मीद मैदान में हैं।
बागियों ने बनाया बहुकोणीय मुकाबला
फिरोजपुर झिरका: यहां के सीटिंग एमएलए इनेलो के नसीम अहमद है। पार्टी ने उन पर दोबारा विश्वास जताया है। इनके पिता शकरूल्ला खां इस सीट से कई बार विधायक और मंत्री रह चुके हैं। इनके मुकाबले पूर्व डिप्टी स्पीकर तथा पूर्व मंत्री अजमत खां के बेटे आजाद मोहम्मद कांग्रेस के उम्मीद के तौर पर हैं।
भाजपा ने यहां से आलम मुंडल को मैदान में उतारा है। इन सब को कड़ी टक्कर कांग्रेस के बागी तथा जिला परिषद के चेयरपर्सन हाजरा बेगम के पुत्र अमन अहमद से मिल रही है। वह हाल में कैंसर का इलाज कराकर आए हैं। इसके बावजूद इनके चुनाव प्रबंधन ने फिरोजपुर झिरका में मोकाबला बहुकोणीय बना दिया है।
इनके अलावा भी कांग्रेस के एक अन्य बागी नेता मैदान में डटे हैं। इस सीट से भाजपा के भी कई टिकट के दावेदार थे। इनमें से एक पूर्व विधायक हबीबुर्रहमान टिकट नहीं मिलने के कारण गोपाल कांडा की पार्टी से मैदान में कूद पडे़ हैं। बाकी टिकट के दावेदारों ने खोमोशी की चादर ओढ़ रखी है।
पिछले पांच वर्षों तक विपक्ष में रहने और सत्ता के बेहद करीब रहने के कारण नसीम अहमद और आजाद मोहम्मद से क्षेत्र की जनता उपेक्षा और बदहाली को लेकर सवाल पूछ रही है। इस बार यहां जीत-हार बहुत हद तक हिंदू वोट के रूख पर निर्भर करेगा। यहां से कुल उम्मीदवार 15 हैं।
पुन्हाना: इस सीट का पिछले परिसीमन में गठन हुआ था। गत् चुनाव से पहले यह क्षेत्र फिरोजपुर झिरका विधानसभा का हिस्सा था। यहां से इनेलो के मोहम्मद इलियास विधायक हैं और इसी पार्टी के उम्मीदवार भी।
इनके मुकाबले में कांग्रेस के सुभान खां, भाजपा के इकबाल जैलदार व पिछले चुनाव में दूसरे और तीसरे नंबर पर रहे दया भड़ाना तथा रहीशा खान निर्दलीय के रूप में मैदान में हैं। रहीशा झिरका के कांग्रेस प्रत्याशी आजाद मोहम्मद के छोटे भाई तथा पूर्व मंत्री अजमत खान के पुत्र हैं।
यहां का चुनावी नतीजा बहुत हद तक बनिया, पंजाबी व सिंगारिया गांवों के लोगों के रूख पर निर्भर है। यहां से भाजपा द्वारा मुसलमान को टिकट देने से पार्टी का परंपरागत वोट बैंक असंमजस में है। पिछले चुनाव में अधिकांश गैर मेवाती वोट दया भड़ाना और मोहम्मद इलियास के बीच बट गए थे। इस बार इसमें सभी सेंध लगाने की फिराक में हैं।
यहां से कांग्रेस और बीजेपी के कई नेता टिकट की लाईन में थे, जो अब खामेश हैं। इस सीट से कुल 14 प्रत्याशी मैदान में हैं। यहां मुकाबला कितना कड़ा है, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि प्रमुख प्रत्याशियों को हरेक दो-चार दिनों पर शक्ति प्रदर्शन के लिए भारी भरकम रैली निकालनी पड़ रही है। इसमें रहीशा अव्वल माने जा रहे हैं।