अरावली से लेकर सुल्तानपुर नेशनल बर्ड सेंचुरी तक, राज्य सरकार समय-समय पर प्रकृति के खिलाफ जाने वाले आदेश जारी कर रही है। जबकि यह पूरा क्षेत्र दिल्ली-एनसीआर के लिए फेफड़े का काम करता है। सुल्तानपुर बर्ड सेंचुरी के इको सेंसिटिव जोन में 1.150 किलोमीटर लंबे मार्ग को फोर लेन करने के प्रस्ताव से पर्यावरणविद् नाराज हैं।
पर्यावरण एवं पक्षी प्रेमियों ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं। पर्यावरणविदें के मुताबिक राज्य सरकार बिल्डरों की लॉबी के आगे कहीं न कहीं नतमस्तक है इसलिए एंटी नेचर फैसले ले रही है। अरावली एवं पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ लड़ाई लडने वाले कर्नल सर्वदमन सिंह का कहना है कि सरकार ने यह बहुत ही गलत फैसला लिया है।
यह प्राइम लैंड है, इसलिए इसके पीछे शायद बिल्डर लॉबी ने पैसे लगाए होंगे। इसकी पड़ताल करके फैसले के खिलाफ कोर्ट का सहारा लिया जाएगा। सरकार ने कहा है कि शाम को छह बजे के बाद कोई निर्माण नहीं होगा, मतलब यह है कि उससे पहले लोग निर्माण कर सकते हैं। इस सरकार ने पूरी अरावली को छलनी कर दिया। अब इसके मंत्रियों, अफसरों की नजर नेशनल बर्ड सेंचुरी के पास बेशकीमती जमीन पर पड़ गई है।
बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के सदस्य एवं बर्ड वाचर एन. शिवकुमार कहते हैं कि राज्य सरकार कभी रेवेन्यू लैंड को वन क्षेत्र से मुक्त करने की बात करती है तो कभी 2014 से पहले के अरावली में हुए निर्माणों को वैध करने का प्रस्ताव लाती है। ऐसी मंशा बिल्डरों को बढ़ावा देती है।
अब बर्ड सेंचुरी की सड़क को चौड़ा करने के नाम पर वहां के संवेदनशील क्षेत्र से छेड़छाड़ करने की तैयारी हो रही है। इस रोड को तो कायदे से रात को बंद कर देना चाहिए। सरकार वैकल्पिक रास्ता तलाशे तो ज्यादा अच्छा है।
राज्य सरकार के एंटी नेचर फैसले
1: अरावली के रेवेन्यू लैंड को राज्य सरकार ने वन क्षेत्र मानने से एक बार इनकार कर दिया था। पर्यावरणविदें ने आवाज उठाई तो फैसला वापस लेना पड़ा।
2: राज्य सरकार ने 2014 से पहले के अरावली में बने फार्महाउसों को वैध करने का प्रस्ताव लाया था। इसके खिलाफ कर्नल सर्वदमन सिंह ने सरकार को नोटिस दिया हुआ है।
3: डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट आर्गेनाइजेशन को 407 एकड़ जमीन बेची, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की एंपावरमेंट कमेटी और पर्यावरण मंत्रालय ने निर्माण की कसेंट नहीं दी।
4: मांगर के आसपास 23 गांवों की 10,426 हेक्टेयर जमीन पर राज्य सरकार ने मांगर डेवलपमेंट प्लान-2031 बनाया था। लेकिन वन क्षेत्र को बचाने के लिए एनसीआर प्लानिंग बोर्ड ने इसकी मंजूरी देने से मना किया।
5: हुड्डा सरकार ने मांगर क्षेत्र में एक डच कंपनी को 500 एकड़ जमीन पर यूरोपियन टेक्नॉलोजी पार्क बनाने की मंजूरी दे दी थी। इस पर केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने रोक लगाई। तब यह प्रोजेक्ट रद्द हुआ।
देश का दूसरा सबसे कम वन क्षेत्र वाला राज्य हरियाणा है। सिर्फ 3.59 फीसदी क्षेत्र वन है, जबकि इको सिस्टम के हिसाब से 33 फीसदी भूक्षेत्र वन होना चाहिए। यहां जो 3.59 फीसदी वन क्षेत्र है उसमें भी बड़ा योगदान अरावली का है।
अरावली में करीब तीन सौ प्रजाति की स्थानीय वनस्पतियां हैं। जबकि स्वदेशी पक्षियों की 120 प्रजातियां हैं।
राज्य सरकार का पक्ष:
जिस सड़क को फोर लेन बनाने की बात हो रही है वह मुख्य पार्क के बाहर है। सड़क के साथ-साथ पौधारोपण किया जाएगा। पार्क के निकट स्पीड ब्रेकरों का निर्माण कराया जाएगा। इको सेंसटिव क्षेत्र से भू-जल का दोहन नहीं किया जाएगा। हॉट मिक्स प्लांट स्थापित नहीं किया जाएगा। पार्क की एक किलोमीटर की सीमा में शाम छह बजे के बाद निर्माण कार्य नहीं होगा। मंजूरी के लिए प्रस्ताव नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ को भेजा जाएगा।