नेपाल, भूटान और चीन से लगती नार्थ ईस्ट की सीमाओं की सुरक्षा में लगे सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) के जवानों के बीच एक शिल्पकार का गुण भी मौजूद होता है। वह गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच जंगलों में पाई जाने वाली लकडिय़ों पर बेहतरीन शिल्पकारी कर अनोखा उदाहरण पेश करते हैं।
उनकी अनेक कलाकृतियां आपको सूरजकुंड मेले में देखने को मिलेंगी। कहा तो यहां तक जा रहा है कि जवानों को अवसाद जैसी बीमारी से बचाने के लिए ड्यूटी के अलावा अन्य प्रकार की रचनात्मक कार्यों में लगाया जाता है। ताकि वह अपने अंदर छिपी प्रतिभा को लकडिय़ों पर शिल्पकारी के रूप में प्रदर्शित कर सकें। इन सामानों की ब्रिकी से मिलने वाला पैसा जवानों के वेलफेयर में लगाया जाता है।
बता दें कि एसएसबी का गठन 1962 में भारत चीन युद्ध के बाद मार्च 1963 में किया गया। जिसका मुख्य उदेश्य नेपाल, भूटान और चीन से लगी नार्थ ईस्ट की सीमाओं की सुरक्षा करने के साथ साथ बार्डर के गांवों में लोगों के अंदर सुरक्षा, राष्ट्रीयता और सतर्कता की भावना विकसित करना है।
वर्तमान में इस बल की तैनाती दक्षिण असम, दक्षिण बंगाल, जम्मू एंड कश्मीर, असम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, सिक्किम, नागालैंड, मिजोरम में बड़े पैमाने पर की जाती है। अब तो इस बल पर नक्सल प्रभावित, उग्रवादी और अलगाववादी इलाकों की भी जिम्मेदारी है। ऐसी विषम परिस्थितियों में अवसाद जैसी बीमारी से बचने के लिए जवानों में शिल्पकार के गुण भी पैदा किए जाते हैं।
सिलीगुड़ी के एसएसबी जवानों द्वारा जंगली लकडिय़ों पर बनाई गई कलाकृतियां मेले में बिक्री के लिए लाई गई हैं। एसएसबी के एएसआई शैलेंद्र सिंह एवं हवलदार दीपांकर ने बताया कि नार्थ ईस्ट के जंगलों में पाई जाने वाली सकुआ, सीरिस, चाइका, टीका जार्क आदि लकडिय़ों पर बल के जवानों द्वारा ईगल, मगरमच्छ, मेढ़क, छिपकली, हिरन, शेर समेत अनेक जानवरों की बेहतरीन शिल्पकारी की गई है। लकड़ी से बनाई गई अनेक आकर्षक सामान एसएसबी के स्टाल पर उपलब्ध हैं।