प्राकृतिक जलाशयों पर भारी पड़ रहा जलवायु परिवर्तन
बारिश की कमी के कारण नूंह में सूख गए 160 जलाशय
राजूद्दीन जंग
नगीना। जलवायु परिवर्तन का असर प्राकृतिक जल संसाधनों पर दिखने लगा है, जिसके कारण जल स्तर में निरंतर गिरावट आ रही है। अरावली पहाड़ियों के ऊपर और तलहटी में बने जलाशय बिल्कुल सूख गए हैं। गांव कोटला, घागस, फिरोजपुर झिरका के झरने न केवल विलुप्त होते जा रहे हैं, बल्कि उनमें पानी की कुछ बूंदें अब दिखाई देती हैं। आंकड़े बताते हैं कि प्राकृतिक जल स्रोतों से छेड़छाड़ इंसानी जिंदगी पर भारी पड़ रही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, नूंह इलाके में पिछले साल तक 160 से अधिक जलाशय सूख गए। जिले की भौंड, घागस, नांगल मुबारिकपुर की अरावली पहाड़ियों पर स्थित तीन प्राकृतिक जलाशयों में पानी नहीं बचा है। यहां भेड़, बकरियां, गायें और भैंस चराने वाले ग्वालों को पहाड़ों पर पानी के लिए भटकना पड़ रहा है। पूर्व सरपंच हजरू कंसाली, सामाजिक कार्यकर्ता जाकिर कोटला, आकेड़ा के इसाक खान ने बताया कि पर्याप्त बारिश न होने के कारण जिले की सबसे बड़ी प्राकृतिक कोटला झील सूखने के कगार पर पहुंच गई है। मेवात क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के चलते अकाल जैसी स्थिति पैदा हो गई है। किसानों के खेत बरसात का इंतजार देख रहे हैं। एनजीओ एसएम सहगल फाउंडेशन ने मेवात विकास अभिकरण के साथ मिलकर नूंह जिले में बनाए गए 53 चैकडेम सूख गए हैं। गांव सांठवाड़ी, करहेड़ा, उलेटा, जैताका समेत एक दर्जन तालाबों में बरसात का पानी है।
सहगल फाउंडेशन के कार्यकर्ता सईद अहमद ने बताया कि नूंह, अलवर के आसपास काफी तालाब बनाए गए हैं। प्राकृतिक जलाशयों के सूखने का कारण जल प्रबंधन के पुख्ता इंतजाम न होना है। उप तहसीलदार रवि कुमार ने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों को संजोने की आवश्यकता है। सरकार बरसात के पानी को बचाकर उपयोग में लाने का काम कर रही है।
कैपशनः कंसाली की अरावली तलहटी में सूखा जलाशय