संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। भारतीय संगीत परंपरा के संरक्षण के लिए वाद्ययंत्रों और उन्हें बनाने वाले शिल्पियों का समान भी जरूरी है। आज वाद्ययंत्र बजाने वालों की चर्चा होती है, लेकिन उन्हें बनाने वाले कारीगरों की चिंता कम लोग ही करते हैं। अगर पारंपरिक वाद्ययंत्रों की जगह केवल इलेक्ट्रॉनिक साधनों का प्रयोग बढ़ता गया, तो वाद्य निर्माण की सदियों पुरानी परंपरा के खत्म होने का खतरा बढ़ जाएगा। यह बातें इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहीं।
वे सोमवार को विश्व संगीत दिवस और संगीत विदुषी डॉ. प्रेमलता शर्मा की पुण्य-स्मृति के मौके पर आयोजित हुए कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे थे। आईजीएनसीए के कलाकोश विभाग और अखिल भारतीय गांधर्व महाविद्यालय मंडल के संयुक्त तत्वावधान आयोजित इस कार्यक्रम में महाराष्ट्र के मिरज में बनने वाले विश्वप्रसिद्ध तानपुरे पर आधारित डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘आरव : मिरज का तानपुरा’ का भी लोकार्पण और प्रदर्शन किया गया। इसके साथ ही पंडित कुमार गंधर्व के शिष्य पंडित सत्यशील देशपांडे ने गायन प्रस्तुति दी।
इस अवसर पर पद्मश्री प्रो. भरत गुप्त सारस्वत मुख्यातिथि और वरिष्ठ शास्त्रीय गायिका डॉ. सुभद्रा देसाई विशिष्ट अतिथि रहे। तानपुरा शिल्पी अल्ताफ मुल्ला और शोधकर्ता डॉ. पीवाई मुल्ला ने मिरज की तानपुरा निर्माण परंपरा, उसके शिल्प और संरक्षण की जरूरत पर अपनी बात रखी। इस मौके पर कलाकोश विभाग के अध्यक्ष प्रो. सुधीर लाल, पंडित सत्यशील देशपांडे भी मौजूद रहे।