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Gurugram News: सगे भाई बनते हैं रावण, कुंभकरण और मारीच

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झाड़सा श्रीकृष्ण मंदिर की रामलीला में 25 साल से कुंभकरण की भूमिका निभा रहे राजकुमार
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संवाद न्यूज एजेंसी
गुरुग्राम। झाड़सा गांव के श्रीकृष्ण मंदिर में रामलीला का अभ्यास जोरों पर है। 21 सितंबर की शाम से मंदिर में रामलीला शुरू हो जाएगी। इस रामलीला में राजकुमार काैशिक पिछले 25 सालों से कुंभकरण की भूमिका निभा रहे हैं। राज कुमार दिल्ली पुलिस में सब इंस्पेक्टर हैं। इनके भाई संजय कौशिक रावण की भूमिका निभाते हैं। शिव कुमार कौशिक इनके सबसे बड़े भाई हैं, जो मारीच की भूमिका निभाते हैं। संजय कौशिक गीतकार हैं। रावण के संवाद भी वे खुद तैयार करते हैं।
मंच पर राजकुमार जब रावण की भूमिका में होते हैं तो सामाजिक जागरूकता के संदेश भी अपने बनाए गीतों, भजनों में पिरोकर प्रस्तुत करते हैं। झाड़सा की रामलीला में राम की भूमिका निभाने वाले हेमंत कौशिक अच्छे गायक है। विभिन्न मौकों पर यहां के राम गाते हुए नजर आते हैं। इस रामलीला के निर्देशक कुल भूषण कौशिक की अपनी एक भजन गायक मंडली है। वे इस रामलीला में लक्ष्मण की भूमिका निभाते हैं। झाड़सा के लाेगों को 21 सितंबर से 3 अक्तूबर तक बेहतरीन संगीत और गीत से सजी यह रामलीला देखने को मिलेगी।
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गुरुग्राम की यह सबसे पुरानी रामलीला बताई जाती है। झाड़सा में श्रीकृष्ण मंदिर की स्थापना बाबा जुगल दास ने सन 1813 में की थी। बाद में बाबा जुगलदास ने ही रामलीला के मंचन की शुरुआत कराई। रामलीला से जुड़े लोग बताते हैं कि तब झाड़सा के तालाब के पास रामलीलाएं होती थी। बताया जाता है कि बगैर माइक के संवाद अदायगी होती थी कि दिल्ली जयपुर हाईवे तक लीला के संवाद सुने जा सकते थे। पेट्रोमैक्स के रोशनी में रामलीला होती थी। 1858-59 में रामलीलाओं की यहां शुरुआत मानी जाती है। पुरानी रामलीला अब तीन हिस्सों में बंट गई है। श्रीकृ़ष्ण मंदिर में 1981 से रामलीला हो रही है। रामचंद्र रामलीला और पुरानी तालाब रामलीला समेत झाड़सा गांव के लोगों की तीन रामलीलाएं इस साल हो रही हैं।



हमारी रामलीला सादगी और बेहतर संगीत के लिए जानी जाती है। रामचरित मानस पर आधारित रामलीला के दौरान भेदभाव से रहित समाज का संदेश भी हमलोग देंगे। -कुलभूषण कौशिक, डायरेक्टर
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रामलीला से नई पीढ़ी भी जुड़ी है। काफी संख्या में लोग यहां आते हैं। हमलोगों ने पुरानी परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं। कोशिश होती है, रामलीला का संगीतमय स्वरूप बना रहे। -राजेंद्र कौशिक, कथा वाचक
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