खनन माफिया देर रात अरावली का सीना चीरते और अलसुबह तक ढुलाई में जुट जाते हैं। हैरानी की बात यह है कि ढुलाई करने वाले डंपर हाईवे के रास्ते ही गंतव्य तक पहुंचते हैं। इस बीच इन्हें दर्जनों नाकों और चैकपोस्ट से गुजरना पड़ता है, लेकिन रोकने और टोकने वाला कोई नहीं। नूंह-सोहना-गुरुग्राम मार्ग पर रात एक बजे के बाद इन डंपरों की लाइन देखी जा सकती है।
एडवोकेट खलील अहमद ने बताया कि उनका घर गुरुग्राम-नूंह हाईवे पर है। रात दो बजे के बाद अक्सर उनकी नींद खुल जाती है। उस समय हाईवे पर पत्थरों से भरे ओवरलोड डंपरों के अलावा कोई वाहन नहीं होता। यह सिलसिला रात 12 बजे के बाद शुरू होता है, जो अलसुबह तीन बजे तक बदस्तूर जारी रहता है। फिरोजपुर झिरका से गुरुग्राम तक कम से कम 20 नाके और चैकपोस्ट बने हैं। इसके बावजूद ये ओवरलोड डंपर गुरुग्राम और दिल्ली कैसे पहुंच जाते हैं, बड़ा सवाल है।
विस्फोटक लगाकर तोड़ते हैं पहाड़
खनन माफिया विस्फोटक लगाकर पहाड़ तोड़ते हैं। ऐसा करने वाले अधिकांश लोग अरावली की तलहटी में बसे गांवों के ही होते हैं। अवैध खनन से गांव का बच्चा-बच्चा वाकिफ है। उन्हें इनके शेड्यूल का भी पूरा ज्ञान होता है। रात में कितने बजे अरावली का रुख कर वहां पहुंचते हैं, कितने बजे तक पहाड़ पर धमाका किया जाता है। इसके बाद कितने बजे तक ढुलाई पूरी की ली जाती है। पचगांव में एक बच्चे से अवैध खनन के बारे में पूछा तो उसने बताया कि पूरा गांव पहाड़ से कमा और खा रहा है। रात 12 बजे के बाद पहाड़ तोड़ाई शुरू होती है। बिना नाप-तोल के पत्थर डंपर में भरे जाते हैं, फिर मुखबिर की सूचना और पूरी सेटिंग के बाद रवानगी शुरू होती है।