गुरुग्राम। मेदांता द मेडिसिटी अस्पताल प्रबंधन ने अवैध कब्जा कर वन विभाग की जमीन पर बिजली घर और दूसरी अति आवश्यक सुविधाएं विकसित कर लीं। इतना ही नहीं, अस्पताल का एक बड़ा हिस्सा भी वन विभाग की जमीन पर ही बना दिया गया। यह खुलासा वन विभाग की जांच रिपोर्ट में हुआ है। इस बारे में क्षेत्रीय वन अधिकारी राजीव तेजयान कहना है कि इस बारे में पूरी तरह से जांच करके एनजीटी को विस्तृत रिपोर्ट सौंपी गई है। जिसे मेदांता अस्पताल प्रबंधन ने भी स्वीकार किया है।
क्षेत्रीय वन अधिकारी का कहना है कि इसी रिपोर्ट के बाद अस्पताल प्रबंधन ने एनजीटी से रियायत मांगते हुए कहा कि अगर उसे ये सुविधाएं यहां से हटानी पड़ी तो अस्पताल का संचालन एक साल तक ठप हो जाएगा। इसलिए वन विभाग को दूसरी जगह जमीन देने का प्रस्ताव अस्पताल प्रबंधन ने रखा है फिलहाल अस्पताल प्रबंधन ने दूसरी जगह किसी तरह की जमीन अभी चिहिन्त नहीं की है। इसी के लिए एनजीटी ने उन्हें एक महीने का समय दिया है।
कंक्रीट की दीवार बनाकर किया है कब्जा
अस्पताल ने कंक्रीट की दीवार बनाकर वन विभाग की जमीन पर कब्जा कर रखा था। अब इसे तोड़कर अंदर खिसका लिया गया है। जिसकी वजह 3200 वर्ग गज जमीन मिल चुकी है। शेष 2300 वर्ग गज जमीन के लिए एनजीटी ने आदेश दिया है। शेष जमीन पर अस्पताल प्रबंधन ने बिजली घर, चिल्लर प्लांट और दूसरी सुविधाएं बना ली हैं। बकौल, अस्पताल प्रबंधन इन्हें हटाना संभव नहीं है। अगर ये हटाई गई तो अस्पताल का संचालन एक साल तक ठप हो जाएग।
2017 से हैं जमीन का विवाद
मेदांता ने वर्ष 2017 में वन विभाग की करीब 5530 वर्ग गज जमीन पर अवैध कब्जा कर यहां बाउंड्री कर ली थी। जिसके खिलाफ सर्वजन कल्याण सेवा समिति के विनोद कुमार ने इसी साल फरवरी माह में एनजीटी में याचिका दायर मामले पर संज्ञान लेने का अनुरोध किया था। विनोद की याचिका पर एनजीटी ने 20 फरवरी को अस्पताल प्रबंधन और वन विभाग के साथ केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस भेजकर कार्यवाही के निर्देेश दिए थे। निर्देशों के बाद कोई कार्यवाही नहीं हुई तो एनजीटी को 11 सितंबर को फिर निर्देश देने पड़े। अब एनजीटी ने एक बार से अस्पताल प्रबंधन को अवैध कब्जा हटाने का निर्देश दिया है।
मेदांता अस्पताल प्रबंधन
मेदांता अस्पताल प्रबंधन की ओर से इस बारे में किसी भी तरह की टिप्पणी नहीं की गई है। लेकिन इनकी ओर से एनजीटी में अपना पक्ष रखा था, जिसमें कहा कि 32 सौ वर्ग गज जमीन से कब्जा हटा लिया है। बाकी की जमीन पर हमारी जरूरी सुविधाएं लगी हुई हैं। इसके बदले वन विभाग को इतनी ही जमीन देने का प्रबंधन तैयार है। हालांकि जो वैकल्पिक जमीन देने को तैयार हैं, वह इस जमीन से महंगी है।