विनोद डबास/प्रेमचंद पालमी
गुरुग्राम/पटौदी। देश की रक्षा के लिए कारगिल में पाकिस्तानी घुसपैठियों से लोहा लेते हुए पिता के शहीद होने के समय हमलोग बहुत ही छोटे थे। हमें अपने पिता के शहीद होने के दौरान की कोई भी बात याद नहीं है, मगर बड़े होने के बाद जब अपने परिजनों, रिश्तेदारों और ग्रामीणों से पिता के शहीद होने के बारे में मालूम हुआ तो सीना गर्व से चौड़ा हो गया। इतना ही नहीं, पिता की बहादुरी के किस्से सुनते हुए खुशी से आंखें नम हो जाती है।
कारगिल युद्ध में शहीद हुए पटौदी क्षेत्र के गांव मुमताजपुर निवासी लांस नायक कमांडो आजाद सिंह का बेटा राजू व बेटी निधि ने कारगिल विजय दिवस की 21वीं वर्षगांठ के अवसर पर अमर उजाला के साथ बातचीत करते हुए पिता की शहादत से जुड़े ऐसे ही कुछ किस्से साझा किए। राजू ने बताया कि पिता की शहादत के समय वह मात्र पांच वर्ष का था और उसे उस समय की बातें याद नहीं हैं, जबकि निधि बताती हैं कि पिता की शहादत के समय वह तो केवल डेढ़ साल की थी।
दोनों भाई-बहन बताते हैं कि देश की रक्षा के लिए पिता के शहीद होने की बातें लोगों से सुनने के दौरान बहुत ही गर्व होता है। उस दौरान उनके मन में भी अपने पिता के नक्शे कदम पर चलते हुए देश के लिए काम करने की अलख जगती है। वह अपनी प्रत्येक कामयाबी पर पिता को याद करते है और सोचते है कि आज उनके पिता होते तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं होता।
राजू बताते है कि उनका सेना में जाकर पिता की तरह देश की रक्षा करने का सपना था, लेकिन वह दिल्ली यूनिवर्सिटी से एमबीए करने के बाद नाइजीरिया में सेल्स मैनेजर के रूप में नौकरी करने पहुंच गए। शायद कुदरत को ऐसा ही मंजूर था, जबकि निधि एमबीबीएस कर रही है उनकी पढ़ाई का मात्र एक वर्ष बचा है और वह सेना में नौकरी करना चाहती है। इस संबंध में उनके परिजन सहमति जता चुके है।
मुश्किल हालात व विपरीत परिस्थिति के बाद भी पाक को मात दी
गुरुग्राम/पटौदी। कारगिल युद्ध में पाकिस्तान घुसपैठियों से तो सीधा सामना नहीं हुआ, लेकिन घुसपैठियों से दो-दो हाथ करने वाले जांबाजों से नियमित तौर पर तालमेल रहता था। कारगिल युद्ध में घायल होने वाले सैनिकों को चिकित्सा सेवा मुहैया कराने वाली टीम के सदस्य रहे सेवानिवृत्त हवलदार राजेंद्र यादव और सैनिकों के पास राशन, हथियार, गोला बारूद आदि सामान पहुंचाने वाले दल के सदस्य के रहे सेवानिवृत्त नायक अनिल कुमार बताते हैं कि पाकिस्तानी घुसपैठियों की अपेक्षा भारतीय सेना के समक्ष हालात मुश्किल थे। इसी तरह परिस्थिति भी विपरीत थी। दरअसल, घुसपैठिया पहाड़ियों के ऊपर थे और भारतीय सेना नीचे थी।
इस कारण उनके लिए भारतीय सेना पर हमला करना आसान था, जबकि भारतीय सेना के लिए नीचे खड़े होकर घुसपैठियों को खदेड़ना मुश्किल था। लिहाजा भारतीय सैनिकों ने पहाड़ियों पर चढ़कर घुसपैठियों को मारना शुरू कर दिया। भारतीय सेना का साहस देखकर घुसपैठियों ने पहाड़ियों से भागने लग गए। इस तरह भारतीय सैनिक पहाड़ियों पर कब्जा करके तिरंगा फहराने लग गए।