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Gurugram News: परिजनों को बिना बताए अस्पताल ने की मॉक ड्रिल, दो लाख जुर्माना

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मॉक ड्रिल में परिजनों से कहा गया कि बच्चे का हो गया है अपहरण, जिला उपभोक्ता फोरम ने सुनाया फैसला
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अमर उजाला ब्यूरो
गुरुग्राम। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने क्लाउड नाइन अस्पताल मेफिल्ड गार्डन पर दो लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। साथ ही पीड़ित को मुकदमे में खर्च हुए 22 हजार रुपये भी देने का आदेश दिया है। पीड़ित, अपनी गर्भवती पत्नी को डिलीवरी के लिए अस्पताल ले गया था। इसके कुछ देर बाद अस्पताल ने घोषणा कर दी थी कि बच्चे का अपहरण हो गया हालांकि बाद में अस्पताल ने इसे सिर्फ मॉक ड्रिल बताया था। हालांकि बच्चे की ब्लड ग्रुप रिपोर्ट में भी गड़बड़ी कर दी थी।
सेक्टर चार निवासी विजय यादव ने आठ मई 2019 को पत्नी डॉ. सुरभि आहूजा को डिलीवरी के लिए क्लाउड नाइन अस्पताल मेफिल्ड गार्डन सेक्टर 47 में भर्ती कराया था। डिलीवरी के दौरान लापरवाही बरतने पर अस्पताल के खिलाफ जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में शिकायत दी थी। आयोग के अध्यक्ष संजीव जिंदल, सदस्य ज्योति सिवाच व खुशविंदर कौर ने पूरे मामले को विस्तार से सुना। शिकायतकर्ता का कहना था कि डॉ. संजय वजीर, डॉ. बीएस यादव, डॉ. गोपाल अग्रवाल, डॉ. मनीष बालदे, डॉ. सुरिंदर कुमार व डॉ. सर्वेश ठाकुर ने पूरे मामले में लापरवाही बरती।
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पीड़ित के वकील यतेश वशिष्ठ ने बताया कि परिवार के सदस्य गायनी रूम के बाहर अच्छे समाचार का इंतजार कर रहे थे। शाम करीब पांच बजे अस्पताल में घोषणा हुई कि डिलीवरी रूम से बच्चा लापता हो गया है। अपहरण के चलते कोड पिंक के साथ हाई अलर्ट जारी किया गया। यह सुनने पर शिकायतकर्ता के परिजन स्तब्ध रह गए और डॉक्टरों से अपने नवजात शिशु के बारे में पूछताछ करने लगे, लेकिन कोई भी जानकारी नहीं मिली। अस्पताल में 30 मिनट तक हाई वोल्टेज ड्रामा चला। बाद में शिकायतकर्ता को बताया गया की पत्नी ने बच्ची को जन्म दिया है।
अस्पताल प्रबंधन ने यह भी बताया कि घोषणा सिर्फ हॉस्पिटल की मॉक ड्रिल थी। 12 मई को जच्चा-बच्चा को डिस्चार्ज करते समय नवजात शिशु का ब्लड ग्रुप बी निगेटिव बताया गया था। परिजनों के अनुसार अगस्त में शिशु के आधार कार्ड के लिए आवेदन करते अस्पताल के कुछ दस्तावेजों में गड़बड़ी होने की जानकारी मिली। एक अन्य रिपोर्ट में खून का ग्रुप ओ पॉजिटिव पाया गया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने क्लाउड नाइन हॉस्पिटल के खिलाफ शिकायत चिकित्सा लापरवाही बोर्ड गुुरुग्राम में दर्ज कराई। उपरोक्त बोर्ड ने देखा कि यद्यपि डिस्चार्ज सारांश में रक्त समूह एक महत्वपूर्ण जानकारी थी। यह डॉक्टर की लापरवाही और उदासीन रवैये को दर्शाता है, सेवा में गंभीर कमी थी। यदि कोई मॉक ड्रिल करनी ही थी तो शिकायतकर्ता और उसके परिवार के सदस्यों को विश्वास में क्योंकि नहीं लिया। वकील ने बताया कि शिकायतकर्ता को काफी मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ा। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में अस्पताल के वकील ने तर्क दिया था कि इस मामले में किसी भी प्रकार की चिकित्सीय लापरवाही नहीं हुई है। डिस्चार्ज शिशु के रक्त समूह से कोई नुकसान नहीं हुआ था।
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पीड़ित के वकील ने तर्क दिया कि डिलीवर रूम के बाहर कोई बच्चा होने का इंतजार कर रहा हो, उसे यह कह दिया जाए कि बच्चे का अपहरण हो गया है। यह कितना पीड़ा दायक होगा। इन परिस्थितियों में यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है। इस प्रकार की घोषणा अत्यधिक मानसिक तनाव उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त थी। आयोग ने माना कि सेवा में गंभीर कमी के साथ-साथ अनुचित तरीके से पीड़ित को मानसिक प्रताड़ना व पीड़ा सहनी पड़ी। आयोग ने अस्पताल को शिकायतकर्ता को मुआवजे के रूप में 2,00,000 रुपये की राशि का भुगतान करने के लिए कहा। मुकदमे के खर्च के रूप में 22,000 रुपये दिए अलग से देने का आदेश दिया। 45 दिनों के भीतर पैसे नहीं देने पर 12 फीसदी ब्याज देना होगा।
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