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एक्सक्लूसिव : ...तो यूनिवर्सिटी प्रबंधन की ओर से जान बूझकर दी जा रही थी डॉक्टर उमर को छूट

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सप्ताह में 1-2 क्लास लेता और 15-20 मिनट बाद ही चला जाता था उमर, अस्पताल में ड्यूटी पर भी नहीं आता था, कॉल कर बुलाना पड़ता था
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- यूनिवर्सिटी के अन्य डॉक्टरों व छात्रों से अमर उजाला की बातचीत

अमर उजाला ब्यूरो
फरीदाबाद। अल फलाह यूनिवर्सिटी का यदि व्हाइट कॉलर टेरर मॉड्यूल से कोई संपर्क नहीं था तो दिल्ली में बम धमाका करने वाले डॉ. उमर को इतनी छूट यहां क्यों दी जा रही थी। अमर उजाला ने यूनिवर्सिटी से एमबीबीएस की पढ़ाई कर यहां अप्रेंटिस कर रहे दो डॉक्टरों से बात की। इन्होंने कहा कि डॉ. उमर शुरू से ही बेहद कम क्लास लेता था। वह सप्ताह में एक या दो लेेक्चर ही लेता और वह भी अधिकतम 15-20 मिनट में खत्म कर वापस अपने रूम में चला जाता था। डॉक्टरों ने बताया कि अन्य लेक्चरार ऐसा नहीं करते वे पूरी समय क्लास लेकर ही बाहर निकलते थे।

अस्पताल में होती थी नाइट शिफ्ट, उसमें भी कॉल कर बुलाना पड़ता था
अमर उजाला से बातचीत में यूनिवर्सिटी के दो डॉक्टरों ने चौंकाने वाला खुलासा किया कि अस्पताल में डॉ. उमर की ड्यूटी हमेशा शाम या नाइट शिफ्ट में लगाई जाती थी। उन्हें कभी भी शुबह की शिफ्ट में ड्यूटी दी ही नहीं गई। ये शिफ्ट शाम 5 बजे से रात 12 बजे तक और रात 12 बजे से सुबह 8 बजे तक वाली होती थी। इसके साथ ही वह ड्यूटी पर आता ही नहीं था। जब भी कोई मरीज उनकी ड्यूटी टाइम में अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती होता तो उन्हें अक्सर कॉल कर ही बुलाना पड़ता था। बार-बार कॉल करने के बाद ही डॉ. उमर अस्पताल में पहुंचकर इलाज करता। कुछ मिनट रुकने के बाद अन्य सहायक स्टॉफ को निर्देश देकर वह वापस अपने कमरे में चला जाता था।
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जब 6 महीने के लिए अस्पताल से चला गया था डॉ. उमर
डॉक्टरों ने बताया कि साल 2023 के दौरान लगभग 6 महीने के लिए डॉ. उमर अस्पताल से चला गया था। इस दौरान किसी को भी ये नहीं पता चला कि वह कहां गया है। साथ ही न तो यूनिवर्सिटी ने उसे नौकरी से निकाला। लगभग 6 महीने बाद उसने अस्पताल लौटकर वापस से ड्यूटी जॉइन कर ली थी। जूनियर व छात्र होने के चलते ये तो किसी से पूछ नहीं सकते थे कि आखिर वो गया कहां। डॉ. उमर व मुजम्मिल के अन्य बैचमेट सीनियर डॉक्टरों को भी उसके आने-जाने की जानकारी नहीं थी।
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