जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जीएसआई) और दिल्ली यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों ने हाल की रिसर्च में कहा है कि यदि हमने प्रकृति के साथ छेड़छाड़ जारी रखी तो पानी से जुड़े खतरे बढ़ते रहेंगे। जलीय खतरा बढ़ने का ट्रेंड देखा जा रहा है। पिछले पांच साल में बाढ़ के रूप में तीन बड़ी तबाहियां इसका उदाहरण हैं। इसलिए अब समय शहरी विकास के दौरान योजनाकारों को भू-वैज्ञानिकों की मदद लेने का है, ताकि लोग नदियों के फ्लड क्षेत्र में न बसें।
यह रिसर्च जीएसआई के वरिष्ठ भू-वैज्ञानिक एचएस सैनी, एसएआई मुज्तबा, दिल्ली यूनिवर्सिटी में जियोलॉजी के प्रो. एनसी पंत और रिसर्च स्कॉलर रवीश लाल ने मिलकर की है। जिसे मशहूर विज्ञान पत्रिका करंट साइंस ने अपने मार्च के अंक में जगह दी है। इन वैज्ञानिकों ने कहा है कि देश के कई शहर नदियों के बाढ़ क्षेत्र में बसे हुए हैं। इनके लिए आज नहीं तो कल पानी खतरा बनेगा। यह रिसर्च जम्मू एवं कश्मीर में 2010, 2014 और उत्तराखंड में 2013 में आए जल प्रलय पर की गई है।
सैनी ने ‘अमर उजाला’ को बताया कि जितनी भी जल तबाही हो रही है, उनमें से ज्यादातर मानवकृत हैं। जब हम खुद खतरनाक क्षेत्र में बसेंगे तो कभी न कभी तो खतरा आएगा ही। इसलिए शहरीकरण की प्लानिंग करते समय यदि हम भू-आकृति का ध्यान रखें तो जन-धन की हानि नहीं होगी। प्रो. पंत का कहना है कि सरकार स्मार्ट सिटी की योजना पर काम कर रही है। इसमें भी भू-आकृति का ध्यान रखने की बेहद जरूरत है। यह पता करने की जरूरत है कि जिस जगह पर शहर बस रहा है, वह पहले किसी नदी का हिस्सा तो नहीं था।
उनका कहना है कि श्रीनगर की डल झील झेलम नदी का ही हिस्सा है। इसलिए जब कभी झेलम रौद्र रूप में आएगी तो इसके आसपास तबाही तय है। श्रीनगर का काफी हिस्सा झेलम के बाढ़ क्षेत्र में बसा हुआ है। इसी प्रकार दिल्ली का पूर्वी हिस्सा यमुना के बाढ़ क्षेत्र में है। कॉमनवेल्थ गेम्स विलेज, अक्षरधाम मंदिर और मिलेनियम पार्क के सामने बना डीटीसी डिपो डूब क्षेत्र में हैं। उत्तराखंड में तो कई क्षेत्र ऐसे हैं। केदारनाथ घाटी में इसीलिए व्यापक जनधन की हानि हुई, क्योंकि लोगों ने नदी के क्षेत्र में अतिक्रमण कर लिया था।
-इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट के लिए भू-वैज्ञानिकों की मदद लेकर सरकार यह पता करती है कि उस क्षेत्र विशेष में बाढ़ और भूकंप का खतरा कितना है, लेकिन शहरी विकास में हमारे योजनाकार इस बात को नजरंदाज करते हैं। डूब क्षेत्र में कोई शहर बसता भी है तो उसकी सुरक्षा के लिए पुख्ता इंतजाम नहीं होते।
-प्रोफेसर पंत के मुताबिक नैनीताल देश का ऐसा पहला शहर है जिसमें घर बनाने से पहले भू-विज्ञान से जुड़े पहलुओं पर अनुमति लेनी होती है। यह मॉडल पूरे देश में लागू करने की जरूरत है।
पांच साल की बड़ी तबाही
- 06 अगस्त 2010 को लेह में बादल फटने के बाद बाढ़। चिनाब नदी का जलस्तर बढ़ने से तबाही।
- 16-17 जून 2013 को उत्तराखंड की मंदाकिनी और अलकनंदा घाटी में आए जल प्रलय में व्यापक जनधन की हानि।
- 6-7 सितंबर 2014 को जम्मू एवं कश्मीर में बाढ़ से हजारों लोग बेघर हुए, अरबों का नुकसान।