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न पानी, न खड़े रहने का ठिकाना, फिर भी ड्यूटी करते हैं रहना, ये है ट्रैफिक पुलिसकर्मियों का असल हाल

Tue, 13 Aug 2019 10:18 AM IST
राजेश सैनी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

-ट्रैफिक पुलिसकर्मियों को नहीं मिलती कोई सरकारी सुविधा
-प्रदूषण के कारण कई ट्रैफिककर्मी हो रहे बीमार, खुद खरीदना पड़ता है मास्क
-हाईकोर्ट ने पुलिस आयुक्त से मांगी है जवानों को मिल रही सुविधाओं की जानकारी
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दिल्ली ट्रैफिक पुलिस - फोटो : social media
दमघोंटू दिल्ली की यातायात व्यवस्था संभालते - संभालते पुलिसकर्मियों को कब और किस तरह की बीमारियां हो जाती हैं पता ही नहीं चलता। प्रदूषण के चलते सांस लेने में दिक्कतें आती हैं तो खुद ही मास्क खरीदना पड़ता है। क्योंकि महकमा तो एक ही मास्क देता है वह भी पंद्रह दिनों में।
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दिल्ली ट्रैफिक पुलिस - फोटो : अमर उजाला
न धूप में कहीं बैठने का इंतजाम है और न ही पेयजल का बंदोबस्त। खुद अपना जुगाड़ करना पड़ता हैं। तब जाकर पूरी दिल्ली की ट्रैफिक को संभाल पाते हैं। 
दिल्ली के छह हजार से ज्यादा यातायात सिपाही रोजाना लोगों के आवागमन को सुगम बनाने के लिए सड़कों पर उतरते हैं। लेकिन इनकी तकलीफें बहुत है। 
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दिल्ली ट्रैफिक पुलिस - फोटो : SELF
गैरसरकारी संगठन लीगल फोरम फॉर वुमन ने ट्रैफिक पुलिसकर्मियों को बुनियादी सुविधाएं देने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। इसके बाद कोर्ट ने 
पुलिस आयुक्त से यातायात पुलिस के जवानों को मिल रही सुविधाओं के बाबत जानकारी मांगी है।

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दिल्ली ट्रैफिक - फोटो : PTI
अमर उजाला ने इसके बाद यह जानने की कोशिश की कि इन जवानों को किसी तरह की समस्याओं से रोजाना दो चार होना पड़ता है। 
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दिल्ली ट्रैफिक पुलिस - फोटो : अमर उजाला
पुरुषोत्तम वर्मा की रिपोर्ट  
पंचशील आउटर रिंग रोड:
सोमवार, दोपहर 2.30 बजे। तीन ट्रैफिककर्मी वाहनों की चेकिंग कर रहे थे। साथ में एएसआई जेडो भी थे। इन पुलिसकर्मियों से उनको मिलने वाली 

सुविधाओं के बारे में पूछा तो वे हंसने लगे।  कहने लगे कि कभी- कभी मास्क मिल जाता है। वह भी 15 दिन में। पीने का पानी नहीं मिलता। न छाता 

मिलता है और न ही छाया। बैठने के लिए जगह भी नहीं मिलती। सुबह आठ से रात आठ बजे तक ड्यूटी करते हैं। यहां तैनात एक पुलिसकर्मी ने बताया 

कि कुछ देर छाया में सुस्ताने को मौका मिल जाए वहीं काफी है। 
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