एक उद्यमी ने सेक्टर-82 में करीब पांच करोड़ रुपये में उद्योग का प्लॉट खरीदा। सर्किल रेट के हिसाब से इसकी कीमत करीब सात करोड़ रुपये थी। रजिस्ट्री के समय उसे सात करोड़ पर ही स्टांप चुकाना पड़ा। अगर वे पांच करोड़ पर रजिस्ट्री कराते तो आयकर विभाग का नोटिस झेलना पड़ता। आयकर सर्किल रेट को ही आधार मानकर प्रॉपर्टी की कीमत निकलता है। सर्किल रेट से कम कीमत होने पर टैक्स चुकाना पड़ता है।
नोएडा में ऐसी संपत्तियों की भरमार है, जिसकी बाजार में कीमत कम है और सर्किल रेट के हिसाब से ज्यादा कीमत बैठ रही है। संस्थागत, व्यवसायिक, औद्योगिक और कार्यालय उपयोग की संपत्तियों का सर्किल रेट ज्यादा है। उससे कम कीमत पर बाजार से भूखंड मिल जाते हैं। खुद रजिस्ट्री विभाग इस बात को स्वीकार कर चुका है।
घटते राजस्व के लिए इसे जिम्मेदार माना है। तमाम जिलों से इसी तरह की रिपोर्ट शासन को भेजी गई, जिस पर शासनादेश (संख्या-23/2015-1132/94-स्टा. नि.-2-15-700(287)/2015) जारी हो गया है। प्रमुख सचिव की तरफ से सूबे के सभी जिलों के डीएम को स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि सर्कल रेट रिवाइज करने का मतलब बढ़ाना ही नहीं होता है बल्कि अगर किसी प्रॉपर्टी की कीमत बाजार से ज्यादा है तो उसे कम भी करना चाहिए।
इसलिए रेट लिस्ट को फिर से रिवाइज करते हुए जिन संपत्तियों के रेट ज्यादा हैं उनको कम किया जाए। इस शासनादेश से सर्कल रेट रिवाइज होने की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। आने वाले दिनों में संस्थागत, व्यवसायिक, औद्योगिक, कार्यालय उपयोग और कुछ रिहायशी एरिया के सर्कल रेट कम हो सकते हैं।