घटती हरियाली से मौसम के कदम लड़खड़ा गए हैं। यदि यही हाल रहा तो आने वाले समय में मौसम और बेहाल करेगा। सूबे में क्षेत्रफल की 33 फीसदी के सापेक्ष हरियाली मात्र 8.77 फीसदी रह गई है।
इससे प्रदूषण बढ़ रहा है और मौसम अपने समय से भटक गया है। सरकारी दावों के अनुसार हरियाली न बढ़ने से ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने और ऋतुओं के गड़बड़ाने का खतरा बढ़ता जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार एक दशक में मौसम ने अपनी पहचान खो दी है। वर्षा, ग्रीष्म और सर्दी आने-जाने का क्रम बिगड़ गया है। अपने समय पर ऋतुओं का असर दिखाई नहीं देता और समय बीतने पर ये रंग दिखाती हैं।
मौसम चक्र गड़बड़ान से स्वास्थ्य और फसलों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। घटती हरियाली और बढ़ते पाल्यूशन से ग्लोबल वार्मिंग और ग्रीन गैसों का असर मौसम पर पड़ता है।
इससे गर्मी, सर्दी-बरसात मानक से बहुत कम या ज्यादा होते हैं। ऐसे में बारिश होगी नहीं, या फिर बहुत ज्यादा होगी। अपने समय पर बरसात नहीं होगी और बेमौसम बरसात परेशान करेगी। यही हाल अन्य ऋतुओं का भी है।
हरियाली के नाम पर धोखा
हरियाली के नाम पर झाड़ियां लगवा रहे हैं। छोटे पौधों से ग्रीन बेल्ट एरिया तो बढ़ जाता है, पर असर नहीं आ पाता। कई हेक्टेयर ग्रीन बेल्ट एक पीपल-बरगद के बराबर आक्सीजन नहीं दे पाता है। ऐसी हरियाली से कागज तो संतुष्ट हो सकते हैं, लेकिन बादल नहीं।
बढ़ते प्रदूषण पर नहीं दे रहे ध्यान
एनसीआर में प्रदूषण का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है। यही कारण है कि तीसरे साल भी गाजियाबाद पाल्यूशन में पहले नंबर पर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के प्रयासों पर अमल नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने हरे पेड़ों के कटान को रोकने और कंक्रीट के जंगलों को नियंत्रित करने की गाइडलाइन तय की हैं। लेकिन इनका अपेक्षित फायदा नहीं मिला। दरअसल अधिकारियों की कमजोर इच्छाशक्ति और उदासीन समाज के चलते कुछ भी सकारात्मक संभव नहीं है।