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दिल्लीः बेटियों की शिक्षा पर कंजूसी

Tue, 16 Sep 2014 09:28 AM IST
विनोद डबास/अमर उजाला, नई दिल्ली
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बेटियों की शिक्षा पर ज्यादा रुपये खर्च करने से क्या मिलेगा। वह तो पराया धन है, जबकि बेटा पूरी उम्र कमा कर देगा और वंश को आगे बढ़ाएगा। वैसे भी लड़कियों को बहुत कम ही नौकरी मिलती है। वह अच्छी नौकरी प्राप्त करने में नाकाम रहती है। ऐसे में उनको आगे बढ़ाना सही नहीं लगता।
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यह राय दिल्ली के ऐसे लोगों की हैं, जो अपने बेटे को पब्लिक स्कूल में, जबकि बेटी को नगर निगम के स्कूल में पढ़ने के लिए भेज रहे हैं। तीनों नगर निगम के स्कूलों में पढ़ने वाले लड़के-लड़कियों की संख्या का आंकड़ा सामने आने के बाद अमर उजाला ने इस संबंध में दो अभिभावकों से बात की।

द्वारका के साथ बसी रोशन गार्डन निवासी सतबीर सिंह से बातचीत के दौरान पता चला कि उनके दो बच्चे हैं। बेटी नगर निगम के स्कूल में पढ़ने जाती है, जबकि बेटे का एडमिशन पब्लिक स्कूल में करा रखा है। इसी तरह द्वारका के पास इंद्र्रा पार्क कॉलोनी निवासी चांद राम के तीन बच्चे हैं। दोनों बेटे तो द्वारका स्थित पब्लिक स्कूल में पढ़ रहे है, वहीं बेटी नगर निगम के स्कूल में पढ़ने जाती है।
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इस भेदभाव के बारे में उन्होंने कई कारण बताए। उनका कहना था कि आय कम होने के कारण उन्होंने ऐसा किया। इसके अलावा लड़कियों का भविष्य उज्ज्वल भी नहीं है। शादी के बाद लड़कियां दूसरे घर चली जाती हैं। ससुराल वाले न तो उनकी पढ़ाई पूरी कराने में रुचि लेते हैं और न ही नौकरी लगवाने की ओर ध्यान दिया जाता है।

ऐसे में बेटियों की पढ़ाई पर अधिक खर्च करना उचित नहीं है। गौरतलब है कि राजधानी में 1000 लड़कों की अपेक्षा 868 लड़कियां हैं। जन्म दर के अनुपात में लड़कों की संख्या अधिक है, लेकिन तीनों नगर निगम के 1744 स्कूलों में 1000 लड़कों की तुलना में 1036 लड़कियां शिक्षा ग्रहण करने के लिए आती हैं।

इस तरह सरकारी स्कूलों में लड़कों की तुलना में लड़कियां अधिक पढ़ रही हैं। इन दोनों आंकड़ों पर गौर करें तो सरकारी स्कूलों में लड़कों की तुलना में 168 लड़कियां अधिक पढ़ रही हैं। उनके स्कूलों में 4,49,051 लड़कियां और 4,35,558 लड़के शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
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