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Ghaziabad News: वाह रे सिस्टम...100 रुपये के नोटेरी कागज पर 15 करोड़ रुपये साल का ठेका

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गाजियाबाद। सरकारी संपत्तियों को बचाने से लेकर अन्य मुद्दों पर संजीदगी दिखाने का दावा करने वाला नगर निगम खुद सवालों के घेरे में है। आरोप है कि निगम ने 24×7 मीडिया को करीब 15 करोड़ रुपये सालाना का विज्ञापन ठेका महज 100 रुपये के नोटरी कागज पर सौंप दिया। इतना ही नहीं, बिना कार्यकारिणी की बैठक के ही निगम क्षेत्र के विस्तार का काम भी उसी ठेकेदार को दे दिया गया। अब इस पूरे मामले में निगम की कार्यप्रणाली, नियमों की अनदेखी और ठेकेदार पर मेहरबानी को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
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बीती 16 मई को हुई बोर्ड बैठक में कार्यकारिणी उपाध्यक्ष प्रवीण चौधरी और सदस्य राजीव शर्मा ने इस पर तीखे सवाल उठाए थे। उन्होंने पूछा था कि बिना कार्यकारिणी की बैठक के ठेकेदार को इतना बड़ा काम क्यों दिया गया? साथ ही आरोप लगाया था कि तय 15 हजार वर्ग मीटर की सीमा के बजाय करीब 45 हजार वर्ग मीटर में विज्ञापन कर ठेकेदार ने नियमों से अधिक कमाई की।
उन्होंने ठेकेदार से अधिक क्षेत्र में किए गए प्रचार से कमाई गई रकम में से नियमानुसार वसूली की मांग की थी। साथ ही इस पर नकेल कसने की मांग भी उठी थी। उन्होंने यह भी कहा था कि इंदिरापुरम क्षेत्र में प्रचार का ठेका किसी दूसरी फर्म को दिया जाना चाहिए।
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2021 में दिया था ठेका
नगर निगम ने जुलाई 2021 में 24×7 मीडिया को यह ठेका दिया था। अनुबंध के मुताबिक, ठेकेदार ने दो करोड़ रुपये सिक्योरिटी जमा की और पहले पांच वर्षों के लिए 15 करोड़ रुपये वार्षिक भुगतान का समझौता हुआ। इसके बाद हर साल 10 प्रतिशत बढ़ोतरी का प्रावधान भी रखा गया।

जनता पर सख्ती, ठेकेदार पर नरमी क्यों

पूर्व कार्यकारिणी सदस्य हिमांशु मित्तल, जिन्होंने मामले में हाईकोर्ट में याचिका दायर की है, बताते हैं कि आम जनता से गृहकर के नाम पर सख्ती से वसूली की जाती है, लेकिन बड़े ठेकेदारों को राहत दी जा रही है। उनका कहना है कि लाखों लोगों पर टैक्स का बोझ डाला जा रहा है, जबकि एक ठेकेदार पर इतनी मेहरबानी दिखाई जा रही है। ऐसी ढील आम नागरिकों को भी मिलनी चाहिए।


यह कहते हैं नियम
अधिवक्ता विपिन कुमार के अनुसार, इतने बड़े वित्तीय अनुबंध को सिर्फ 100 रुपये के स्टांप पर नहीं किया जा सकता। नियमों के मुताबिक रजिस्ट्री कार्यालय में विधिवत किरायानामा तैयार होना चाहिए था, जिस पर कुल अनुबंध राशि का लगभग चार प्रतिशत राजस्व जमा करना पड़ता। इस हिसाब से करीब 60 लाख रुपये की स्टांप ड्यूटी बनती थी। बताया गया कि इस भुगतान से बचने के लिए ठेकेदार ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन राहत नहीं मिली। इसके बाद मामला प्रशासन स्तर पर लंबित चल रहा है।


नगर निगम और कंपनी का पक्ष

मामला काफी पुराना है। डीएम के स्तर पर प्रकरण विचाराधीन है। अनुबंध में साफ लिखा हुआ है कि नियम के तहत जो भी अदायगी होगी, उसको ठेकेदार के स्तर पर वहन किया जाएगा।
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-संजीव सिन्हा, तत्कालीन प्रचार प्रभारी, नगर निगम, गाजियाबाद


हम नियम के तहत ही काम कर रहे हैं। निगम से हमारा जो भी अनुबंध हुआ है, उसका पालन करेंगे और अब तक किया है।
-अमरदीप चहल, ऑपरेशन हेड, 24×7 मीडिया
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