गाजियाबाद। लखनऊ की जिस इमारत में आग लगने से 15 युवाओं की जान गई, वहां हादसे का कारण शॉर्ट सर्किट माना जा रहा है। ऐसे हादसों से बचाव के लिए पांच किलोवाट से अधिक क्षमता का घरेलू, व्यावसायिक या औद्योगिक बिजली कनेक्शन लेने के लिए वायरिंग कॉन्ट्रैक्टर टेस्ट रिपोर्ट आवश्यक होती है। नियमानुसार यह रिपोर्ट क्लास-ए कॉन्ट्रैक्टर्स की तकनीकी टीम मौके पर निरीक्षण और जांच के बाद जारी करती है। यह नियम सुरक्षा को ध्यान में रखकर बनाया गया था, लेकिन जिले में इसका सही तरीके से पालन नहीं हो रहा है।
स्थिति यह है कि कनेक्शन जारी करने के अधिकांश मामलों में न तो कोई तकनीकी टीम मौके पर जाती है और न ही वायरिंग या विद्युत उपकरणों की जांच की जाती है। घर बैठे रिपोर्ट जारी की जा रही हैं और उसी आधार पर बिजली कनेक्शन भी मिल जाता है। ऐसी व्यवस्था हादसे को न्योता देने के सिवाय कुछ और नहीं है।
जिले में 11.5 लाख से अधिक बिजली कनेक्शन हैं। इनमें करीब तीन लाख कनेक्शन ऐसे हैं, जिनकी क्षमता पांच किलोवाट से अधिक है। मोदीनगर, लोनी और सदर तहसील क्षेत्र में इस श्रेणी के 50 से अधिक उपभोक्ताओं से बातचीत में सामने आया कि अधिकांश लोग लंबे समय से व्यावसायिक और औद्योगिक कनेक्शन का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन उन्हें यह तक जानकारी नहीं कि कनेक्शन जारी होने के समय वायरिंग कॉन्ट्रैक्टर टेस्ट रिपोर्ट जमा करनी होती है। यह रिपोर्ट किस कॉन्ट्रैक्टर ने तैयार की और कहां से जारी हुई, इसकी जानकारी भी अधिकांश उपभोक्ताओं के पास नहीं है।
चौंकाने वाली बात यह भी है कि अधिकांश लोग यह तक नहीं जानते कि क्लास-1 कॉन्ट्रैक्टर्स कौन हैं और उनके कार्यालय कहां स्थित हैं। हालांकि, ऊर्जा निगम की कनेक्शन जारी करने वाली इकाई को इनके बारे में पूरी जानकारी रहती है। जिले में ऐसे अधिकृत कॉन्ट्रैक्टर्स की संख्या 200 से अधिक बताई जा रही है।
केस-1
गंगा विहार कॉलोनी निवासी महावीर चौधरी ने बताया कि उनके यहां आठ किलोवाट का कनेक्शन है, लेकिन उनको वायरिंग कॉन्ट्रैक्टर टेस्ट रिपोर्ट के बारे में कोई जानकारी नहीं है। कनेक्शन देते वक्त ऊर्जा निगम की ओर से भी इस बारे में नहीं बताया गया।
केस-2
गदाना रोड निवासी मनीष चौधरी ने बताया कि उनके यहां 15 किलोवाट का कनेक्शन है, जो आठ वर्ष पूर्व लिया गया था। कनेक्शन लेते वक्त उनको वायरिंग कॉन्ट्रैक्टर टेस्ट रिपोर्ट की जानकारी नहीं थी और न ही कोई इस संबंध में जांच करने आया।
कॉन्ट्रैक्टर्स की जवाबदेही तय होनी चाहिए
वरिष्ठ अधिवक्ता विपिन कुमार का कहना है कि वायरिंग कॉन्ट्रैक्टर टेस्ट रिपोर्ट जारी करने वाले अधिकृत कॉन्ट्रैक्टर्स की जवाबदेही तय की जानी चाहिए। शॉर्ट सर्किट से यदि आग जैसी घटना होती है तो संबंधित कॉन्ट्रैक्टर को भी कार्रवाई के दायरे में लाया जाना चाहिए। इससे इस तरह की अनियमितताओं पर रोक लग सकती है। साथ ही ऊर्जा निगम के किसी अधिकारी की ओर से रिपोर्ट का सत्यापन भी जरूरी होना चाहिए।
इसलिए बनाया गया था नियम
ऊर्जा निगम के अधीक्षण अभियंता अनिल कुमार सिंह ने बताया कि वायरिंग कॉन्ट्रैक्टर टेस्ट रिपोर्ट की व्यवस्था इसलिए बनाई गई थी ताकि तकनीकी विशेषज्ञ मौके पर जाकर भवन की वायरिंग, विद्युत उपकरणों और उनकी क्षमता का निरीक्षण करे और खामियों की जानकारी दें। कमियां दूर होने के बाद ही कनेक्शन जारी किया जाए। उन्होंने कहा कि मौके पर तकनीकी व्यक्ति निरीक्षण के लिए गया या नहीं, इससे ऊर्जा निगम का सीधा संबंध नहीं है। निगम के स्तर पर दस्तावेजों की जांच के बाद ही कनेक्शन जारी किया जाता है।
जिम्मेदार बोले
वायरिंग कॉन्ट्रैक्टर टेस्ट रिपोर्ट की जिम्मेदारी विद्युत सुरक्षा विभाग की है। इस संबंध में विभाग के उपनिदेशक सौरभ कुमार सिंह का कहना है कि रिपोर्ट लगाने वाले कॉन्ट्रैक्टर्स के लाइसेंस का रिन्यूवल तभी किया जाता है, जब उनके यहां तकनीकी जानकार व अन्य संसाधन पूरे होते हैं। अगर मौके पर जाकर जांच नहीं करने की शिकायत मिलती है तो ऐसी स्थिति में संबंधित के खिलाफ कार्रवाई की जाती है। लखनऊ की घटना के बाद इन पर और सख्ती की जाएगी।