कविनगर, सिटी और विजयनगर क्षेत्र की हाईराइज सोसायटियों में रोजाना दो बच्चों का जन्म फ्लैट में हो रहा है। इसकी पुष्टि नगर निगम में जन्म प्रमाणपत्र के लिए आ रहे आवेदन कर रहे हैं। नगर निगम के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के बीच इन तीनों जोन की हाईराइज सोसायटियों से 732 ऐसे आवेदन प्राप्त हुए, जिनमें शिशु का जन्म घर पर होना दर्शाया गया है। खास बात यह है कि स्कूलों में दाखिले के समय, यानी फरवरी-मार्च में जन्म प्रमाणपत्र के लिए आवेदनों की संख्या 25 से 30 फीसदी तक बढ़ जाती है। इस वर्ष फरवरी-मार्च के दौरान कविनगर जोन से 1306, विजयनगर से 557 और सिटी जोन से 660 जन्म प्रमाणपत्र जारी किए गए।
इनमें से 1893 बच्चों का जन्म अस्पतालों में हुआ, जिनकी सूचना सीधे अस्पतालों से जोनल कार्यालयों को प्राप्त हुई। वहीं, 630 मामलों में प्रसव घर पर हुआ, जिनमें 123 बच्चे हाईराइज सोसायटियों के फ्लैटों में जन्मे। इस प्रकार तीनों जोन में लगभग हर चौथा बच्चा घर में जन्म ले रहा है।
कविनगर जोनल कार्यालय के प्रभारी राजेश गुप्ता ने बताया कि फरवरी-मार्च को छोड़कर अन्य महीनों में हर महीने 150 से 170 आवेदन घर पर प्रसव के आते हैं। उन्होंने कहा कि अभिभावक शपथपत्र में स्पष्ट रूप से फ्लैट में जन्म होने की जानकारी देते हैं।
दावों पर उठे सवाल
स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि जिले में 100 फीसदी प्रसव सरकारी या निजी अस्पतालों में हो रहे हैं। अधिकारियों के अनुसार, गर्भवती महिलाओं की देखभाल से लेकर प्रसव तक की जिम्मेदारी आशा कार्यकर्ताओं की होती है और इसके लिए उन्हें प्रोत्साहन राशि भी दी जाती है। हालांकि, नगर निगम के आंकड़े इस दावे से अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं।
21 दिन बाद लंबी प्रक्रिया
जोनल प्रभारी राजेश गुप्ता के अनुसार, अस्पताल से सीधे सूचना मिलने पर जन्म प्रमाणपत्र तुरंत जारी कर दिया जाता है। लेकिन जन्म के 21 दिन के भीतर सूचना न देने पर अभिभावकों को मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन और शपथपत्र दाखिल करना पड़ता है। इसके साथ स्थानीय जनप्रतिनिधि का लेटरहेड भी संलग्न करना होता है, जो घर पर जन्म की पुष्टि करता है। निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही प्रमाणपत्र जारी किया जाता है।
यह कहते हैं जानकार
नगर निगम के पूर्व सहायक सुभाष शर्मा के अनुसार, घर में जन्म का शपथपत्र देकर प्रमाणपत्र बनवाने वाले अधिकांश अभिभावक वे होते हैं, जिन्होंने 21 दिन के भीतर आवेदन नहीं किया होता। इसके अलावा, प्रमाणपत्र में त्रुटि या गैर-पंजीकृत अस्पताल में प्रसव होने की स्थिति में भी लोग इस प्रक्रिया का सहारा लेते हैं, क्योंकि संशोधन की प्रक्रिया जटिल है।
कराई जाएगी जांच
मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. अमित विक्रम ने कहा कि गर्भवती महिलाओं की देखभाल और प्रसव सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी आशा कार्यकर्ताओं और संबंधित स्वास्थ्य केंद्र प्रभारियों की है। यदि किसी क्षेत्र में घर पर प्रसव हुए हैं, तो यह जांच का विषय है कि संबंधित स्वास्थ्य कर्मियों को इसकी जानकारी क्यों नहीं हो सकी।