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Ghaziabad News: भाजपा का अभेद दुर्ग बना नगर निगम, हर बार बड़ी होती गई जीत

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गाजियाबाद। नगर निगम भाजपा का अभेद दुर्ग बन गया है। 1995 में नगर निगम के गठन के बाद से 2023 तक हुए छह आम चुनाव और एक उपचुनाव में विपक्षी दलों का कोई भी प्रत्याशी भाजपा के इस दुर्ग को भेदकर मेयर की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाया है। इसके उलट हर बार इस सीट पर भाजपा की जीत हर बार बड़ी होती चली गई। अब 2023 में भाजपा की सुनीता दयाल को 2.87 लाख के अंतर से प्रचंड जीत मिली है।
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वर्ष 2017 में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर मेयर बनीं आशा शर्मा को 567118 वोटों में से 282799 वोट मिले थे। उन्होंने अपनी निकटतम प्रतिद्वंद्वी और कांग्रेस की मेयर प्रत्याशी डॉली शर्मा को 163675 वोटों के अंतर से हराया था। इससे पहले 2016 में हुए मेयर उपचुनाव में अशु वर्मा को कुल पड़े 227484 वोटों में से 115900 वोट मिले थे। यानी कुल मतों में 50.94 फीसदी वोट शेयर भाजपा के अशु वर्मा का था। इससे पहले 2012 के चुनाव में वोटों का अंतर भले कम था, लेकिन मेयर पद पर भाजपा के ही तेलूराम कांबोज ने जीत हासिल की थी। वर्ष 2006 में भाजपा के ही टिकट पर दमयंती गोयल ने जीत हासिल की थी। इससे पहले 1995 से वर्ष 2005 तक भाजपा के दिनेश चंद गर्ग लगातार दो बार जीतकर मेयर बने थे।
सपा के शासनकाल में भी मेयर सीट पर काबिज न हो पाया पार्टी का मेयर
वर्ष 2012 में प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कार्यकाल में हुए नगर निकाय चुनाव में सपा की ओर से सुधन रावत मेयर पद पर मैदान में थे, भाजपा ने वरिष्ठ पत्रकार तेलूराम कांबोज को चुनाव मैदान में उतारा था। दोनों में कांटे की टक्कर थी, देर रात तक चली मतगणना के दौरान एक समय सपा के सुधन रावत को विजयी घोषित कर दिया गया था। बाद में भाजपा के तेलूराम कांबोज ने मतगणना में गड़बड़ी का आरोप लगाकर दोबारा मतगणना कराने की मांग कर दी। भाजपाइयों ने हंगामा किया तो दोबारा मतगणना हुई और भाजपा के तेलूराम कांबोज को विजयी घोषित किया गया। समाजवादी पार्टी भाजपा के इस दुर्ग में तब भी सेंध नहीं लगा पाई थी।
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कैडर वोट बैंक से मजबूत हुआ भाजपा का किला
गाजियाबाद में आरएसएस की मजबूत पकड़ शुरूआत से ही रही है। भाजपा के गठन से पहले भी संघ के चुनाव चिह्न पर गाजियाबाद में कार्यकर्ता चुनाव मैदान में उतरते थे। धीरे-धीरे संघ का दायरा बढ़ता गया। इसके अलावा वैश्य वर्ग, ब्राह्मण, व्यापारी वर्ग में मजबूत पकड़ की वजह से भी भाजपा की किला और मजबूत होता चला गया।
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